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________________ अध्याय : पांचवां ] [ २४५ ... अपनरत मार्ग महायजी हमार्थ सिद्धये । अर्हदेव पद द्वन्द्व भक्तिश्चात्यन्त निश्चला ॥३६६।। यान्यत्र प्रतिबिम्बानि स्वर्ग लोके जिनेशिनाम् । . विमान: चैत्य . वृक्षेषु मेर्वाध पवनेषु च ॥३६७॥ . तेषां पूर्वमहं कृत्वा स्वद्रव्यैः स्वर्ग संभवः । पुष्प चन्दन नैवेधैर्गन्ध दोपाक्षतोत्करैः ॥३९८॥ गीत वादित्र निर्घोषः स्तुति स्तोममनोहरः । स्वर्गश्वर्य ग्रहीष्यामि . ततस्त्रिदशवन्दितः ॥३६६।। इति सर्वश देवस्य कृत्वा पूजामहोत्सबम् ।.. स्वीकरोति ततो राज्यं पट्टबन्धादि लक्षणम् ।।४००।। . . . . . तत्पश्चात् वह इंन्द्र विचारता है कि जीवों के रागादिक र अग्नि की ज्वाला सम्यक् चारित्र रूपी जल को सींचे. बिना सैकड़ों जन्म लेने पर भी नहीं बुझती। ऐसा- सम्यक् चारित्र इस स्वर्ग में .मुलभ नहीं है, इसलिए क्या . करूं ? इस स्वर्ग लोक में तो सम्यग्दर्शन की ही योग्यता है, चारित्र को योग्यता नहीं है। इस कारण मेरे स्वार्थ के लिए तत्त्वार्थ श्रद्धान ही कल्याणकारी व श्रेष्ठ है, तथा अरहन्त भगवान के चरण युगल में अत्यन्त निश्चल भक्ति करना ही कल्याणकारी है। इसलिए यहां स्वर्ग में विमानों, चैत्यवृक्षों तथा. मेरु आदि के उपवनों में जो जिनेन्द्र भगवान के प्रतिविम्ब हैं। उनका प्रथम ही इस स्वर्ग के उत्पन्न हुए, अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतों के समूह से गुजन करके तथा गीत नत्य वादियों के शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवों से बंदनीय स्वर्ग के ऐश्वर्य को ग्रहण करना चाहिये । इस प्रकार विचार कर वह इन्द्र सर्वज्ञ देव की पूजा करके महान् उत्सव पूर्वक पट्टबंधादिक है लक्षण जिसका ऐसे स्वर्ग के राज्य को ग्रहण करता है । तस्मिन्मनोजवनि विचरन्तों यच्छया । वनाद्रि सागरान्तेषु दीयन्ते ते दिवौकसः ॥४०२।। तत्पश्चात् वे. स्वर्ग के देव मन के समान वेग वाले विमानों के द्वारा स्वछन्द विचरते हुए वन, पर्वत ब समुद्रों के तीर पर क्रीडा करते रहते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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