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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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सेना है और ये प्यादे हैं। तथा यह प्रापकी सात प्रकार की सेना है, पूर्व के इन्द्रों द्वारा पालित है; यह आपके चरण कमलों को प्रार्थना पूर्वक नमस्कार करती है। यह समस्त स्वर्गीय राज्य दिव्य सम्पदाओं से शोभित है, सो अापके पुण्य के प्रताप से आपके सन्मुख हुआ है, नम्रीभूत हैं देव जिममें ऐसा है, सो पाप ग्रहण कीजिये। इस प्रकार प्रति स्नेहयुक्त अत्यन्त प्रीति पुर्धक कहला हैं, उसी समय इन्द्र अवधिज्ञान को प्राप्त होकर पूर्व जन्म सम्बन्धी समस्त वृतान्त को जान जाता है। . . . . . . . __ अहो तपः पुरा . चीणं मयान्यजनश्चरम् ।
वित्तीणं चामयं वान प्रागिनां जीवितापिताम् ||३६०॥ पाराधितं मनः शुद्धया हाम्रोधादि चतुष्टयम् । . देवश्च जगतां नाथः सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥३६१॥ निर्दग्धं विषयारण्यं स्वरवैरी निपातितः । कवायतर. वश्छिन्ना राग शत्रुनियन्त्रितः ॥३६.२॥ . सर्वस्तस्य प्रभावोऽयमहं. येनाद्य युगतेः। उद्धत्य स्थापितं स्वर्गहाज्ये त्रिदशवन्दिते ॥३६३॥ .
तत्पश्चात् वह इन्द्र अवधिज्ञान से सब जानकर मन ही मन में कहता है कि अहो! देखो, मैंने पूर्व भव में अन्य से पाचरण करने में नहीं पाये ऐसे ता को धारा किया तथा अनेक जीवों को मैंने अभयदान दिया । तथा दर्शन, ज्ञान, चारित्र तप, इन चारों आराधनानों से अलोक्य के नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर देवाधि देव का. आराधन किया था 1 तथा मैंने पूर्व भव में इन्द्रियों के विषय रूप वन को दग्ध किया था, काम रूप शत्रु का नाश किया था, कपाय रूप वृक्षों को काट दिया था और रागरूको शत्रु को पीड़ित किया था। उसी का यह प्रभाव है। उक्तः ।। याचरणों ने ही इस समय मुझे दुर्गति से बचाकर इस देवों के वंदनीय स्वर्ग के राज्य में स्थापित किया है।
रागादिदहन ज्वाला न प्रशाम्यन्ति देहिनाम् ।। सद्धृत्तवार्य संसिक्ताः क्वचिज्जन्म शतैरपि ॥३६४॥ .. तन्नात्र सुलभं मन्ये तक्ति कुर्भोऽधुना वयम् । सुराणां स्वर्गलोकेऽस्मिन्दर्शनस्यैव योग्यता ॥३६५।।
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