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[ गो. प्र. चिन्तामि
पंक्ति से विराजमान ( शोभायमान ) तथा चित्त रूपी भ्रमर को रंजायमान करने वाले जम्बुद्वीप के बराबर लाख योजन का चिन्तवन करें ।
स्वर्णाचलमयों दिव्यां तत्र स्मरति कणिकाम् । स्फुरत्पिङ्ग प्रभा जाल पिशङ्गित दिगन्तराम् ||४२५ ॥
तत्पश्चात् उस कमल के मध्य सुचिल (मेरु) के समान, स्फुरायमान है.. पीतरंग की प्रभा का समूह जिसमें तथा उसके द्वारा पीतरंग को कर दी हैं दशों दिशायें जिसने ऐसी एक कणिका का ध्यान करे ।
शरच्चन्द्र निभं तस्यामुन्नतं हरिविष्टरम् । तत्रात्मानं सुखासीनं प्रशान्तमिति
उस कमल की करिका में एक ऊंचा सिहासन चितवन करें उस स्वरूप, क्षोभ रहित चितवन करें ।
॥४२६२
शरद ऋतु के चन्द्रमा के सम्मान स्तन का सिंहासन में अपने आत्मा को सुखरूप, शान्त (चित्र नं० २ देखें)
आग्नेय धारणा का स्वरूप
राग षादि निःशेष कलङ्क क्षपणक्षमम् । उक्तं च भवोद्भूत कर्म सन्तान शातने ॥ ४२७३॥
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उस सिंहासन पर बैठे हुए अपने श्रात्मा को ऐसा विचारे कि मह. रागद्वेषादि समस्त कलंकों को क्षय करने में समर्थ है और संसार में उत्पन्न हुए जो जो कर्म हैं, उनके सन्तान को नाश करने में उद्यमी है ।
ततोऽसौ निश्चलाभ्यासात्कमलं नाभिमण्डले ।
स्मरत्यति मनोहारि षोडशोन्नत पत्रकम् ॥ ४२८ ॥
तत्पश्चात् योगी (ध्यानी ) निश्चल अभ्यास से अपने नाभिमण्डल में १६ सोलह ऊंचे ऊंचे पत्रों के एक मनोहर कमल का ध्यान (चितवन) करें । प्रतिपत्र समासीन स्वर माला विराजितम् ।
कणिकायां महामन्त्रं विस्फुरन्तं विचिन्तयेत् ॥४२६॥
तत्पश्चात् उस कमल की कणिका में महामन्त्र का ( जो मार्ग कहा जाता है उसका ) चिन्तन करे और उस कमल के सोलह पत्रों पर था इ ई उ ऊ ऋ ऋ लृ लृ ए ऐ श्री श्री मंः इन १६ अक्षरों का ध्यान करे । (चित्र नं० ३)