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पृष्ठ संस्या .
पदस्थ ध्यान का स्वरूप-२५३-२६३, पंचपर- ... मेष्ठी महामंत्र का चितवन-२६३-२६७, मंगलोत्तम शरण पदों का ध्यान-२६७, विद्यानों के ध्यान-२६५-२७६, अन्य विद्याओं के ध्यान २७६-२८० रूपस्थध्यान का स्वरूप२८०-२८.८, रूपातीत ध्यान का वर्णन२८८-२६५, धर्म ध्यान का फल व वर्णन२६५-३०२, अट्ठाईस मूलगुणों का वर्णन३०२-३१२, अन्तरायों का स्वरूप-३१२-- ३१५, चौदह मलों का वर्णन-३१५-३१६, . . . पिण्डशुद्धि प्रादि का वर्णन-३१६-३१७, उद्गम दोषों का नाम निर्देश-३१७-३२८, उत्पादन दोषों का प्रतिपादन-३२८-३४१. श्राहार ग्रहण व त्यागने के कारणों का वर्णन--३४२-३४४, मुनि कौनसा आहार ग्रहण करते हैं-३४४-३४.६, भिक्षा के लिए ......
गगमन की प्रवृत्ति-३४६, दश प्रकार के साधु.:३४६-३५०, प्राचार्य का स्वरूप--३५०-३५१,
प्रायिकाओं के प्राचार्य-३५१-३५२, तपो का स्वरूप व भेद--३.५२, . प्रायश्चित का :: स्वरूप व भेद--३५-३६६, विनय तप- . . .. ३६६-३७४, स्वाध्याय तंप -४७४-३७५, .. .. ध्यान-३७५, दशलक्षण धर्म--३७५३७६, . . पंचाचार-३५७, गुप्ति-३७७-३७८, उपा- ...