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क्रमांक
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ध्याय परमेष्ठी - ३७५ श्रुतज्ञान व द्वादशांग के २० भेद - ३७६- ३८१, द्वाशांग के नाम व इन बारह अंगों की पद संख्या और स्वरूप३०१-३०५, पूर्वगत के भेद और लक्षण३८६- ३६०, अंगबाह्य के अनेक भेद- ३२०३२२, तपस्वी के लक्षण और भेद- ३६२३६३, मुनियों की समाचार निति - ३६३३६६, एकाकी विहार- ३६६ -४०१, पांच, प्रकार के मुनियों का शाश्रय क्यों करें ?४०१-४०२, आगन्तुक मुनि के साथ व्यवहार-४०२-४०३, छोड़ने योग्य श्रोता - ४०३ - ४०५, विस्तार समाचार विधि-४०४४०५-४११, आर्यिकाओं का वर्णन-४११४१४, परिषद् - ४१४-४२२, परिषह विजय का फल - ४२२-४२६, संक्षेप से ध्यान का लक्षणभेद व फल - ४२६-४३२, बारह अनुप्रेक्षा वर्णन - ४३२-४३७, शुक्लध्यान का स्परूप व भेद-४३७-४५०, सिद्ध भगवान-४५०-४५८, १० मुनि भेदों का स्वरूप-४५८-४६२. ]
(८) अध्याय छठा - शेष गुणस्थानों का वर्णन [ सातवें गुणस्थान से चौदहवें गुणस्थानों तक परिभाषा सहित स्वरूप - ४६३-४६६, समवशरण का वर्णन -- ४६६-४७९.]
पृष्ठ संख्या
४६३--४७६