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क्रमांक
[ ७ ]
-दो वरन
[नरकों का वर्णन - ४८० - ४८४ मध्य लोक का वर्णन ४८४ - ४८६, जम्बू द्वीप आदि की रचना व विस्तार - ४८६ - ५०५, मनुष्य क्षेत्र . की सीमा व भेदादि -- ५०५ - ५०७, तप ऋद्धि के सात भेद - ५०७ - ५०६, रससिद्धि - ५०६५१०, म्लेच्छों के दो भेद-५१० ५१२, कर्म भूमियों का वर्णन - ५१२ - ५१३, मनुष्यों की तिर्यञ्चों की आयु का वर्णन - ५१३ - ५१४, उर्ध्व लोक वन – ५१५ - ५३४ तक देवों के भेदादि का वर्णन - ५१५-५१७, भवन वासियों के भेद - ५१७ - ५१८, व्यंतर देवों के भेद - ५१, ज्योतिषी देवों के भेद गति आदि -५१८-५२०, व्यवहार काल का हेतु-५२० वैमानिक देवों का वर्णन --५२० ५२८, स्वर्ग के देवों की श्रायु वर्णन --- ५२८ -५३३, सिद्ध लोक व सिद्ध शिला का वन – ५३३ - ५३४]
(5) अध्याय : प्राठवां-द्रव्य वन----
[ जीवत तत्त्व का वर्णन - ५३५ - ५६१, जीव वर्णन --- ५६१-५६७, महापुरुषों का वर्णन - ५६८-६१७, तीर्थंकर महापुरुष - ६१७-६३१, पंचकल्याणक --- ६३१-७४० ]
पृष्ठ संख्या
४८०-५३४
५३५-७४०