________________
अध्याय : आठवां ]
द्वित्रितुर्येन्द्रियाणां च सर्वेषां हरिताङ्गिनाम् ।
अनेकाकार संस्थानं हुण्डाख्यं स्याद् विरूपकम् ।।१३६५ ।।
पृथ्वीकायिक जीवों के शरीर का आकार मसूर के करण सदृश, जलकायिक जीवों के शरीर का आकार डाभ के अग्रभाग पर रखी हुई जलबिन्दु के सदृश, अनि कायिकों का खड़ी सुइयों के समूह सदृश और वायुकायिक जीवों के शरीर का संस्थान ध्वजा के सदृश होता है । समचतुरस्त्र संस्थान, व्यग्रोध, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक ये ह संस्थान संसारी जीवों के होते हैं। मनुष्यों और पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के छहों संस्थान होते हैं । देवों के समचतुरस्त्र संस्थान और नारकियों के हुण्डक संस्थान ही होते हैं । द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों के तथा सम्पूर्ण वनस्पतिकायिक जीवों के fafar आकारों के लिये हुए विरूप आकार वाला हुण्डक संस्थान होता है ।
संसारी जीवों के संहननों का विवेचन
म्लेच्छ विद्यमर्त्यानां संज्ञि पञ्चेन्द्रियात्मनाम् । कर्मभूज तिरश्चां च सन्ति संहनानि षट् ॥१३६६॥ संज्ञि विलाक्षाणां लब्ध्य पर्याप्त देहिनाम् । शुभं चान्तिमं हीनं षष्ठं संहननं भवेत् ॥१३६७॥ वजर्षभादि नाराचं वज्रास्थिमय वेष्ठितम् । श्रच नाराचं वज्रास्थितं द्वितीयकम् ॥१३६८ ॥ मारावं त्रीणि चेमानि सन्ति संहननानि च । परिहार विशुद्धयास्य संघमाप्त मुनीशिनाम् ।। १३६६॥ चतुर्थमर्ध नाराचं कोलिकाख्यं च पञ्चमम् । सम्प्रतापाद्यादिकं सिंहनानि च ॥१४००
[ ५७६
इमानि स्युः स्फुर्ट कर्मभूमि द्रव्ययोषिताम् । भोग भूमि जनूंस्त्रीणामार्थ संहननं परम् ॥१४०१॥ मिथ्यात्वाथ प्रसत्तान्त गुरराणस्थानेषु सप्तसु । वर्तमान atari सन्ति संहननानि षट् ॥। १४०२ ।। पूर्वकरणाभियेऽनिवृत्ति कराये I सूक्ष्मादि साम्परायाल्ये हयुपशान्तकषायके ११४०३॥