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________________ ५७८ ] । गो. प्र. चिन्तामणि स्फटिक की उपमा को धारण करने वाली कर्मोन्न नाम की महायोनि में तीर्थकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव और प्रतिवासुदेव उत्पन्न होते हैं । ___ वंश पत्र नाम की योनि में भोग भूमिज और शंखावर्त एवं वंशपत्र इन दोनों में कर्मभूमिज आदि अन्य सांधारण मनुष्य जन्म लेते हैं, किन्तु शंखावर्तनामक कुयोनि में नियम से गर्भ के विनाश होता है । क्योंकि वह गर्भ अशुभ होता है । इस प्रकार जीवों की इन योनियो के लक्षण कहे हैं। जीवों के शरीरों की अवगाहना-- पश्यप्तेजो मरुस्कायानां सूक्ष्मवाद रास्मनाम् । अङ्गगुलस्याप्यसंख्यात भागतुल्यं वपुर्भवेत् ।।१३८८॥ सूक्ष्मा पर्याप्त जगह निकोलस्वाजिनो मतम् । तृतीये' समये सर्वजघन्याङ्ग जगत्त्रये ॥१३८६॥ सर्वोत्कृष्ट शरीरं स्यान्मत्यानां महतां भुवि । तयोर्मध्ये परेषां स्युर्माना देहानि देहिनाम् ॥१३६०॥ सूक्ष्म और बादर पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक जीवों के शरीर की अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग-प्रसारण होती है । त्रैलोक्य में सर्वजघन्य अवगाहना सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के उत्पन्न होने से तीसरे समय में होती है और शरीर की सर्वोत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यों के होती है । इन दोनों (जघन्योत्कृष्ट) के बीच में अन्य जीवों के शरीर को मध्य अवगाहना विविध प्रकार की होती है। अब जीयों के संस्थानों का कथन-- पृथ्व्यङ्गिनां च संस्थान मसूरिकाकरणाकृतिः । अंपकायानां हि संस्थान दभग्रिविन्दुसन्निभम् ॥१३६१॥ .. तेजः कायात्मनां तत् स्यात् सूचीकलापसम्मितम् । संस्थानं वायुकायानां पताकाकारमेव च ॥१३६२।। समादिचतुरस्त्रं च न्यग्रोधस्वाति कुन्जकाः । वामनाल्यं हि हुण्डाख्यं संस्थानामीति षड्भुवि ।।१३६३॥ मनुष्याणां च पञ्चाक्षतिरश्चा सन्ति तानि षट् । देवनामादि संस्थानं नारकाणां हि हुण्डकम् ॥१३६४॥ --- --- -- -- -- -.-.-.-.-..-------------...-.---..-.---- .. - ... समपाल
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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