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अध्याय : पाठवां ]
[ ५७७ तीर्थशाश्चकिरणो रामा वासुदेवाश्चतद्विषः । फर्मोग्नतम महायोनी जायन्ते स्फटिकोपमे ॥१३८५।।.. बंशपत्राख्य योनी धोत्पद्यन्ते भोग भूमिजाः । द्वियोन्योः प्रारिपनोऽन्ये. शङ्खावर्तवंश पत्रयोः ॥१३८६॥ शङ्कावर्तकुयोनौ च नियमेन विनश्यति । गर्भोऽशुभोऽङ्गि नामेतधामीनां लक्षणं भवेत् ।।१३८७॥
सचित्त, अचित्त एवं सचित्ताचित्त, शीत, उष्णा एवं शीतोष्ण, संवत, विवत एवं संवृतविवृत (मिश्र) इस प्रकार योनियों नौ प्रकार की हैं। . . .. .
देव और नारकियों की योनियाँ प्रात्मप्रदेशों से रहित अचित होती हैं, तथा गर्भज जीवों के सचित्ताचित्त (मिश्र) योनि होती है।
एकेन्द्रिय, द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और सम्मूर्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीवों में से किन्हीं जीवों में से किन्हीं किन्हीं जीवों की सचित्त-योनि है, किन्हीं की अचित योनि हैं और किन्हीं जीवों के सचित्ताचित्त (मिश्र) योनि है । इस प्रकार सम्मूर्च्छन जन्म बालों के तीनों प्रकार की योनियां मानी गई हैं।
देव और नारकियों में किन्हीं की शीत योनियां, किन्हीं की उष्ण योनियां और किन्हीं की शीतोष्ण योनियां होती हैं।
अग्निकायिक जीवों को उष्णयोनि, जलकायिक जीवों को शीत योनि होती है। शेष पृथ्वी, वायु और वनस्पतिकायिक जीवों के तथा एकेन्द्रिय, हीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय
और सम्मरछन जन्म वाले जीवों के पृथक-पृथक् एक रूप से शीत प्रादि तीनों योनियां होती हैं । अर्थात् किन्ही जीवों के शीत, किन्हीं के कारण और किन्हीं के मित्र इस प्रकार तीनों योनियां होती है।
देव, नारकी और एकेन्द्रिय जीवों के संवृत योनि होती है। विकलेन्द्रि जीवों के विवृत (प्रगट) योनि और गर्भज जीवों के नियम से संवृत (मिश्र) योनी होती है । ।
इसके पश्चात योनी सम्बन्धी पाप नाश के लिए शुभ अशुभ कर्मोदय से युक्त गर्भज जीवों के विशेषता पूर्वक तीन प्रकार की योनियां कहूँगा।
प्रथम शंखावत, द्वितीय कर्मोन्नत और तृतीय वंशपत्र नामक तीन प्रकार की योनियां होती हैं।