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________________ . ५७६ ] [ गो. प्र. चिन्तामपि विद्याधरों ( इन सब ) की चौदह लाख कोटि, इस प्रकाह सम्पूर्ण कहे गये हैं । जिनेन्द्र भगवान ने आगम में पृथिवोकायिक से लेकर मनुष्य पर्यंत सम्पूर्ण संसारी जीवों के कुल कोटि की संख्या का योग एक करोड़ निन्यानवे लाख पचास हजार कोटि (१,६६,५०,००,०००,०००,००० ) कहा है । इस प्रकार विद्वानों को जीवों के कुल और जाति यादि के भेदों को भली प्रकार जानकर धर्मरूपी रत्नों की खान के संदृश निरन्तर छह काय जीवों की दवा में में उपक्रम करना चाहिये । tra योनियों के मेद, प्रभेद आकार और स्वामी सचित्ताचित्त मिश्राख्याः शीतोष्ण मिश्रयनयः । संवृता विवृता मिश्राश्चेत्येता नवयोनयः ।। १३७५३॥ darni नारकारणां चाचित्तयो निविचेतना । गर्भजाना सचितावित योनिश्चेतनेतरा ॥१३७६॥ एकाक्ष द्वीन्द्रियाणां च त्र्यक्षतुर्येन्द्रियात्मनाम् । नानापञ्चाक्ष सम्मूर्च्छकानां केषाञ्चिदेव च ॥१३७७॥ सचित्तकास्ति केषामेवाश्वेत्ता योनिरजसा । केषाञ्चिन्मियोनिश्चेति त्रिधा योनयो मताः ॥१३७८॥३ देवानां नारकारणां च केषां चिच्छ्रोत योनयः । उष्णयोनिश्च केषां चिदिति द्विविधं योनयः ॥ १३७६॥ तेजसा मुष्णयोनिः स्याच्छीतयोनिर्जलाङ्गिनाम् । शेषाणां पृथिवी वायु वनस्पति शरीरिणाम् ।। १३८० ॥ एक द्वित्रिचतुः पञ्चाक्षयर्भेतर जन्मिनाम् । पृथक रूपेरण शीताद्याः स्युस्त्रियोनयः ।। १३८१ ॥ नारकाक्ष देवानां संवृत्ता योनिरस्ति । विवृता विकलाक्षाणां मिश्रा सा गर्भ जन्मिनाम् ।। १३८२ ॥ griर्भात योनीनां शुभाशुभो भयात्मनाम् । सविशेषास्त्रिधा artisarumaानये ॥१३८३ ॥४ शङ्खाया योनिः पराकूर्मोसाभिया । तृतीय वंश पत्रात्यात्रेति त्रिविधयोनयः ।। १३८४१४
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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