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अध्याय : पाठवां ] भिन्न-भिन्न जीवों की कुल कोटिया कहते हैं- .
द्वाविंशकोटि लक्षारिण. पृथ्वीनां स्युः कुलानि च। अपकाया मतां सप्तकोटि लक्षारिण तेजसाम् ।।१३६५॥. : कुलत्रिकोटि लक्षारी वायूनां च कुलाया। स्युः सप्त कोटि लक्षारिण वनस्पत्यङ्गिनां तथा ।।१३६६॥ कुलानि कोटि लक्षागि. ह्यष्टाविशतिरेवहि । द्वान्द्रियाणां संथा सप्तकोटि लक्षकुलानि च ॥१३६७॥ वीन्द्रियारणां भवन्त्यष्टकोटिलक्ष कुलान्यपि । तुर्याक्षारणां नवैव स्युः कोटिलक्षकुलानि च ॥१३६८॥ अरचराणां हि लक्षारिंग साध द्वादश कोटयः ।.. कुलानि पक्षिणां द्वादशकोटि लक्षकानि च ॥१३६६॥ . . दशव कोटि लक्षारिण कुलानि स्युश्चतुष्पदाम् । नवैध कोटि लक्षाण्युरः सपरिणां कुलानि च ॥१३७०।। वदिशकोटि लक्षाणि कुलानिस्युः सुधाभुजाम् । पञ्चविंशति कोटि लक्षारिण नारक जन्मिनाम ॥१३७१॥ आर्यम्लेच्छ न भोगामिमनुष्याणां कुलानि च । . द्वि सप्तकोटि लक्षापीति सर्वेषां च देहिनाम ॥१३७२।। एकव .कोटि कोटि नवतिः साधनवाधिका। कोटीलक्षारिप सिद्धान्ते कुल संख्या जिनोदिता ॥१३७३।। इत्यङ्ग कुलजात्यावोन् सम्यग्ज्ञात्वा बुधोत्तमैः । षड्ङ्गिनां दया कार्या धर्मरत्लखनी सदा ॥१३७४।।
शरीर के भेदों के कारणभूत नाना प्रकार की नो कर्म वर्गणाओं को कुल कहते हैं) पृथ्वीकायिक जीवों की बाईस लाख कोटि, जलकायिक जीवों की सात लाख कोटि, अग्निकायिक जीवों की तीन लाख कोटि, वायुकायिक जीवों की सात लाख कोटि, वनस्पतिकायिक जीवों की २८ लाख कोटि, द्वीन्द्रिय जीवों की सात लाख कोटि, त्रीन्द्रिय जीवों को आठ लाख कोटि, चतुरिन्द्र जीवों की नव लाख कोटि, जलचर जीवों की १२ लाख कोटि, पक्षियों की बारह लाख कोटि, चतुष्पद (पशुओं) की दश लाख "कोदि, छातो के सहारे चलने वाले सर्प आदिको की नव लाख कोटि, देवों की २६ लाल क्रोटि, नारकी जीवों की २५ लाख कोटि तथा नार्य मनुष्य, म्लेच्छ मनुष्य और