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[ मा. प्र. चिन्तामणि मर्शका भ्रमरा दंशाः पङ्गगा मधुमक्षिकाः ।.. .: मक्षिका कोटकाद्याः स्युश्चतुरिन्द्रियजातयः ॥१३६१।। जलस्थलनभो. गामिनस्तियञ्चो नरामराः ।। नारकाः श्री जिनः प्रोक्ताः पञ्चाक्षाः सकलेन्द्रियाः ११३६२॥ एताप्रसाङ्गिनः सम्यग्ज्ञात्वा मुहितपोधनाः । पालयन्तु समित्याद्यः सर्वत्र स्वमिवान्यहम् ।।१३६३॥ इति पृथ्वयादिकायानां जातिभेदान् जिनागमात् । प्राख्यायातः सतांवृक्ष्ये कुलानि विविधानि च ।।१३६४॥
दुःख से उद्घ गित त्रस जीव विकलेन्द्रिदय और सकलेन्द्रिय के भेद से दो प्रकार के होते हैं।
इनमें से कुनि प्रादिन्द्रिय, मोद्रिय और चतुरीन्द्रिय के भेद से विकलेन्द्रिय जीव तीन प्रकार के होते हैं। मनुष्य, देव और तिर्यञ्च ये सकलेन्द्रिय स हैं।
कृमि, सीप, शंख, वालुका, कौंडी, जौंक आदि दो इन्द्रिय से चिन्हित इन जीवों को द्वीन्द्रिय जीव कहते हैं।
कुन्यु, खटमल, जू, विच्छ, चींटी, दीमक और कान खतरे आदि तीन इन्द्रियों से युक्त जीवों को बेन्द्रिय जीव कहते हैं ।
मच्छर, भौंरा, डांस, पाङ्गा, मधुमक्खी, मक्खि और कोटक आदि चतुरिन्द्रय जीव कहलाते हैं ।
जल-स्थल एवं नभचर तिर्यञ्च, मनुष्य, देव और नारकी ये जीव पचेन्द्रिय होते हैं, इन्हें ही जिनेन्द्र भगवान ने सकलेन्द्रिय कहा है।
इस प्रकार स जीवों के भेद प्रभेदों को भली प्रकार जानकर श्रावको एवं तपोधनों को समिति आदि के द्वारा अपनी आत्मा के सदृश ही सर्वत्र अस जीवों की रक्षा करनी चाहिये।
इस प्रकार जिनागम से पृथ्वी काय आदि षटकाय के जीवों के जाति भेदों को कहकर अब अनेक प्रकार के कुल भेदों को कहूँगा।
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