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अध्याय : पाठवा
प्रतिस्खलन्ति ये स्थूलाः स्थावरा गमनादिषु । केचिदृश्या अदृश्यास्ते बाद: श्री जिनमताः ॥१३५६॥
जिनकी शिरा-बहिः स्नायु, सन्धि-रेखाबन्ध और पर्व-गाठ अप्रगट हों और जिन वनस्पतियों का भंग करने पर समान भंग हो, दोनों भंगों में परस्पर सूत्र-तन्तु न लगा रहे तथा शरोरों को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी जो ऊग जाते हैं तथा वृद्धि आदि को प्राप्त होते हैं ऐसे अनन्तकायिक वे सब जीव यहां पर साधारण कहे गये हैं । जो जीव इन चिन्हों से रहित हैं, वे प्रत्येक (अप्रतिष्ठत) वनस्पतिकायिक हैं।
पृथ्वी प्रादिक पांचों कायों को धारण करने वाले पांचों बादर स्थावर जीव इस लोक में कहीं हैं. और नहीं हैं, किन्तु दृष्टि अगोचर पृथ्वीकायिक पांचों सूक्ष्म स्थावर जीव तीनों लोक को परिपूर्ण करते हुए सर्वत्र रहते हैं। .
विद्वानों को अन्य अनन्त प्रकार के सूक्ष्म और बादर वनस्पतिकायिक व स्थावर जीवों की रक्षा करनी चाहिए।
सूक्ष्म नाम कर्म के उदय से युक्त पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक आदि के द्वारा जिन जीवों की गति आदि कभी भी रुकती नहीं है, उसे. सूक्ष्म कायिक कहते हैं।
जिन स्थावर जीवों की गति आदि दूसरों से रुकती है और दूसरों को रोकती हैं, उन्हें जिनेन्द्र भगवान ने बादर जीव कहा है, इनमें कुछ जीव दृष्टि अगोचर होते हैं। स जीवों के भेद प्राधि का वर्णन---
प्राणिनी विकलाक्षाश्च सकलाक्षास्ततः परे। इस्यमी द्विविधाः प्रोक्तास्त्रसा उस गिनोऽसुखात् ॥१३५७॥ द्वित्रितुर्याख्यभेदाचं स्त्रिविधा विकलेन्द्रियाः । स्युः कम्याचा नूगीर्वाणतिर्यञ्चः सकलेन्द्रियाः ॥१३५८१॥ कृमयः शुक्तिकाः शङ्खाः पालकाश्म कपई काः ।। जलकामा मत्ताः शास्त्रे द्वीन्द्रिया द्वीन्द्रियांगिला ॥१३५६।। कुन्धवो मरकुरणा यूका वश्चिकाश्व पिपीलिकाः । उहिका हि गोम्याद्यास्त्रीन्द्रियास्थ्यक्षसंयुताः ॥१३६०॥