________________
[ गो. प्र. चिन्तामणि
aonmangam
अस्य भास्यमाह :--
शैवाल जलगत हरित रूपं, पणकं भूमिगत शैवाल, इष्कादि प्रभवं च, केणुकः, पालम्बकछत्राणि शुक्ल हरित नील रूपाणि अपस्करोद् भवानि कवगः
गालबकछत्राणि । पुष्पिका आहारकञ्जिकादि पता: ! इत्याद्याः स्थूला अनन्तकायिकाः स्युः ।
अर्थ :- सैवाल, परणक, केणुक, कवग और पुष्पक इत्यादि ये सब बादर अनन्तकायिक बनस्पतियां हैं।
अब इसी को भाष्य रूप में कहते है :___ जल में जो हरी काई होती है, उसे शवाल, भूमि में जो हरी-हरी काई होती है. उसे पणक, ईट आदि में जो उत्पन्न होती है, उसे केगुक, श्वेत, हरे और नील वर्ण के छत्र सदृश को आलम्बक (कुकुरमुत्ता), मल या कचरे में उत्पन्न होने वाले को कवग, वक छत्र को शृगाल कहते हैं, (एक प्रकार का कुकुरमुत्ता, जिसकी डंठल टेडी होती है।) आहार कांजी आदि के ऊपर उत्पन्न होने वाली फ दी को पुष्पिका कहते हैं । इस प्रकार सेवालादि अनेक बादर अनन्तकायिक वनस्पतियां होती हैं। साधारण, प्रत्येक सूक्ष्म एवं बादर जीवों के लक्षण और उनके निवास क्षेत्र प्रादि का कथन
गूढानि स्युः सिरासन्धि परिण जन्मिनां भुवि । येषां स्यान्सम भङ्ग चाही रुक सूत्र सन्निभम् ॥१३५०॥ छिन्न भिन्न शरीराणि प्रारोहन्त्यप्यानन्ततः। तेऽत्र साधारणा जीवाः प्रत्येकास्तद् विपर्ययाः ॥१३५१।। एते स्युर्वादशजोवाः क्वचिल्लोके क्वचिन्न च।। पृथ्व्यादि कायमापन्नाः पञ्चधाः स्थावराः परे ॥१३५२॥ . . सूक्ष्माः पृथ्व्यादयः पञ्चस्थावरा रष्टगोचराः। एते तिष्ठन्ति । सर्वत्र प्रपूर्य भुवनत्रयम् ॥१३५३३३ वनस्पत्यनिनोऽन्ये च स्थावराः सूक्ष्मवादराः। .. अनन्ताधिविधा एसे रक्षणीयाः सदा बुधः ।।१३५४।। न प्रतिस्खलनं येषां गत्यादौ सूक्ष्मदेहिनाम। पृथ्वोजलाग्निकातार्जातु ते सूक्ष्म कायिकाः ॥१३५५।।
-Lamin