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अध्याय : आठवां
[ ५७१ उन्हें नित्य निगोदिया कहते हैं। इन अनन्त कायिक जोकों के पांच भेद माने गये हैं, जो जिनेन्द्र के द्वारा जम्बूद्वीप आदि के दृष्टान्तों से स्कन्ध, अंडर, आवास, पुलवि और शरीर आदि के रूप में प्रतिपादन किये गये हैं। जम्बूद्वोप आदि के दृष्टान्तों द्वारा स्कन्ध, अण्डर, प्रादि का प्रतिपादन- ..
जम्बूद्वीप यथा क्षेत्र भारसं भारतेऽस्ति ।। कोशलः कोशले देशेऽयोध्यायां सौधपङ्क्तयः ।।१३४३॥ तथा स्कन्धा असंख्येयलोक प्रदेश मात्रकाः । एकैकस्मिन् पृथक् स्कन्धे हरण्डरा गदिता जिनः ।।१३४४ः। असंख्यलोक तुल्यान्दैकैकस्मिानण्डरे स्मृताः । प्रायासेभ्यो हवसंख्यात लोक मात्रा न संशयः ।।१३४५॥ . एकैकस्मिन् तथा बासे प्रोक्ता पुलक्योऽखिलाः । असंख्घलोक माना एकैस्मिन् पुलवो भवे ॥१३४६।। असंख्यात शरीराणि लोकमानानि सन्ति च । एककस्मिन्नि कोताना मायोरे प्रारिनो अदा : १३ अलीतानन्त कालोस्थानन्त सिद्ध भ्य एवं च। सर्वेभ्यः प्रागमे प्रोक्ता पाण्यानन्त गुणा जिनः ।।१३४८।।
जैसे जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र है, भरत क्षेत्र में कोशल देश है, कोशल देश में आयोध्या नगरी है, और एक-एक अयोध्या नगरी में अनेक प्रासाद (महल) पंक्तियां हैं, उसी प्रकार असंख्यात लोक प्रमाण पुद्गल परमाणुओं का एक स्कन्ध और एक-एक स्कन्ध में असंख्यात लोक, असंख्यात लोक प्रमाण आवास हैं, इसमें कोई संशय नहीं है । पृथक्-पृथक एक-एक प्रावास में असंख्यात लोक-असंख्यात लोक प्रमाण पुलवियाँ हैं, एक-एक पुलवि में असंख्यात लोक असंख्यात लोक प्रमाण शरीर हैं और पृथक्पृथक् एक-एक निगोद शरीर में जिनेन्द्र भगवान के द्वारा प्रागम में अतीत और आगामी अनंतकाल में होने वाले सर्व अनंत सिद्धों के अनंत गुरंगी जीव राशि कहीं गई है। अर्थात् अतीत और अनागत में होने वाली सर्व सिद्ध राशि का जितना प्रमाण है, उससे अनन्त गुणे जीव एक निगोद शरीर में रहते हैं। बावर अनन्तकाय जीवों का कथन--
शैवालं पणनाम केणुगः कवगस्तथा । पुष्पि केल्यादयः सन्त्वनन्त कायाश्च बादराः ॥१३४६॥