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________________ ५७० ] के मध्य बेंत आदि होते हैं । साधारण वनस्पति कायिक जीवों के लक्षण यादि -- 212112 [ गो. प्र. चिन्तामणि एते प्रत्येक कायाः स्युः केचिच्चानन्त कायिकाः । केचिद् बोजोद्भवाः केचित् सम्मूच्छिका हि देहिनः ।। १३३५ ।। नित्येतर निकोताभ्यां द्विवा साधारणामताः । अनन्त: fret ater अनन्तकाक्ष संकुलाः ॥१३३६॥ यत्रैको प्रारणी 'तत्रैवानन्तजस्मिनाम् । मरणं चेककालेन तत्समं ह्वयक कायत: ॥१३३७॥ यत्रो जायते जीवस्तत्रोत्पत्ति भवेत्स्फुटम् अनन्त देहिनां सार्धं तेन तत् क्षण मज्जसा ।।१३३८ ॥ ततस्तेऽनन्त जीवात्ताः प्रोक्ता श्रनन्त कायिकाः । युगपन्म रणोत्पत्ते रमन्ते केन्द्रियात्मनाम् भ्रमभिदु भंवादवीम् । ॥१३३६॥ 1 तीव्रमिध्यादियुक्तं श्रनन्तां प्राणिभिर्धार दु:कर्मप्रसितात्मभिः ॥१३४०॥ अनन्त काय वर्गेषु न सत्यं कदाचन 1 १" । प्राप्तं तेनन् कायात्ताः मता नित्यनिकोतकरः ॥१३४१॥ श्रनन्त कायिका एते पञ्च भेदामता इति । जम्बूद्रीपाद दृष्टान्तैः स्कन्धा डरादयो जिनेः ॥ १३४२ || ये पूर्व कथित जीव प्रत्येक काय हैं, इनमें कोई-कोई श्रनन्तकाय हैं, कोई बीज से उत्पन्न होने वाले हैं, और कोई जीव सम्मृच्छेन जन्म वाले हैं । साधारण वनस्पति कायिक जीवों के नित्य निगोद और इतर निगोद, ये दो भेद हैं । ये अनन्त कायिक अर्थात् साधारण अनन्त एकेन्द्रिय जीव एक काय होने से एक ही समय में जहां एक जीव उत्पन्न होता है, वहीं एक साथ अनन्त जीवों का मरसा होता है और उसी क्षण एक साथ अनन्त जीव जन्म लेते हैं । इन अनन्त एकेन्द्रिय जीवों का एक ही साथ मरण और एक ही साथ जन्म होता है, इसीलिए उन अनन्त जीवों के समूह को कहते हैं । जो तीव्र मिथ्यात्व श्रादि से युक्त और और दुष्कर्मों से ग्रसित हैं, ऐसे अनन्तानन्त प्राणी भयावह संसार रूपी अटवी में भ्रमण करते हैं. । अनन्तकाय जीवों के समूह में जो जीव कभी भी त्रस पर्याय को प्राप्त नहीं करते,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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