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________________ अध्याय : पाठवां ] [ ५६६ भूलारपोर कद स्कन्धबीजोद भवदेहिनः । स्वा पत्राणि प्रवालामि पुष्पाणि च फलान्यपि ॥१३३३॥ मुख्छागुल्मानि बल्ली च तुरण पर्वादि कायिकाः । प्रत्येकादि चतुर्भेदानां सभेवा मता इसे ।।१३३४॥ जिनागम में प्रसाधारण (प्रत्येक) वनस्पतिकायिक और साधारण वनस्पतिकायिक के भेद से बनस्पतिकायिक जीवों के संक्षेप से दो भेद कहे गये हैं। इनमें से असाधरण अर्थात् प्रत्येक वनस्पति सप्रतिष्ठित (साधारण सहित) और अप्रतिष्ठित (साधारण सहित) के भेद से दो प्रकार की है । (मिट्टी और) जल आदि के सम्बन्ध होने वाली सम्मूर्छन जन्म वाली बनस्पतियां भी सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित के भेद से दो प्रकार की होती हैं। मूल, अग्र, पोर, कन्द, स्कन्ध और बीज से उत्पन्न होने वाले वनस्पतिकायिक जीव, तथा त्वक् पत्र, प्रवाल पुष्प, फल, गुच्छा, गुल्म, बल्ली, तृण और पर्व आदि प्रत्येक के वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक और बनस्पति जीव ये चार भेद माने गये हैं। इन वनस्पतियों के भेदों का सुख पूर्वक बोध प्राप्त करने को कहते हैं :-- जिनकी मूल से उत्पत्ति होती है, वे मूल जीव हैं, जैसे--अदरख, हल्दी आदि । जो भग्न (टहनी) से उत्पन्न होते हैं, वे अग्र जीव हैं । यथा--केतकी, गुलाब, प्रार्यका, मोगरा आदि जो पर्व के प्रदेश (गांठ) से उत्पन्न होते हैं, वे पोर बीज हैं, यथा ईख, बेंत आदि । जो कन्द से उत्पन्न होते हैं, वे कन्द जीव हैं । यथा-सकरकन्दी, पिण्डालू (सूरण) प्रादि । जिनकी उत्पत्ति स्कन्ध से होती है, वे स्कन्ध जीव हैं, यथा सल्लकी (साल), कटकी, बड़, पीपल, पलाश, देवदारू आदि । जिन जीवों की भूमि एवं जल सादि सामग्री के सहयोग से उत्पत्ति होती है, वे बीज जीव हैं, यथा--जव, गोहूँ आदि । वृक्ष आदि की बाह्य छाल को त्वक् और युतक (काई) आदि को सैवाल कहते हैं । जिसमें केवल पत्ते ही होते हैं, पुष्प और फल नहीं होते, उसे पत्र वृक्ष कहते हैं । पत्तों की पूर्व अवस्था को प्रवाल कहते हैं। जिन वनस्पतियों में मात्र पुष्प होते हैं. फल मादि नहीं होते, उसे पुष्प वनस्पतिः कहते हैं। पुष्प के बिना जिसमें केवल फल उत्पन्न होते हैं, उन्हें फल वृक्ष कहते हैं। एक समय में उत्पन्न होने वाले बहुत के समुदाय को गुच्छा कहते हैं। मोगरा, मल्लिका प्रादि को गुल्म और करंज, कथारी आदि को वल्जी कहते हैं। मालती आदिक नाना प्रकार के तृण हैं, पर्व और ग्रन्थि म animawatistincricine
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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