________________
५६८ ]
[ मो. प्र.चिन्तामणि अंगार रूप अग्नि, ज्वालास्नि, अचि अरिन, दीपशिखाग्नि, मुर्मराग्नि, कार्षाग्नि और बहुत प्रकार की शुद्धागि, विद्युत्पालान, पानि, कान्त आदि से उत्पन्न अग्नि, सामान्य अग्नि, निर्धू माग्नि, बडवाग्नि, नन्दीश्वर द्वीपस्थ महाधूम कण्डों की अग्नि तथा मुकुट आदि से उत्पन्न अग्नि, अग्नि काय होने से इन सब अग्नियों का अनिलयोनियों में अन्तर्भाव हो जाता है। तेजकाय के प्राश्रित रहने वाले सर्व तेजकायिक जीवों को भली प्रकार जान मुनिजन इनकी अहर्निश प्रयत्न पूर्वक रक्षा करते हैं । वायुकायिक जीवों के स्थानों का वर्णन--
वासः सामान्यरूपश्चोभ्रंम ऊर्व भ्रमन् व्रजेत् । उत्कलि मण्डलि पृथ्वीलग्नो भ्रमन् प्रगच्छति ॥१३२७॥ गुरुआबातो... महाबातो वृक्षादि भङ्गकारकः । धनोवधिश्च नाम्ना धनानि लस्नुवात वाक् ।।१३२८॥ उदरस्थ विमानाधार पृथ्थ्य धस्तलाश्रिताः। त्रिलोकाच्छादका वाता प्रवान्त भवन्ति च ॥१३२६।। एतान् वातङ्ग भेदांश्चजीयान् वात वपुःश्रितान् । माथा नित्यं प्रयत्नेन पालयन्तु स्ववद्विदः ।।१३३०१
सामान्य रूप वायु, उद्भ्रम वायु, ऊपर भ्रमण करने वाली वायु, उत्कलि वायु, मण्डल वायु, पृथ्वी स्पर्श कर भ्रमण करने वाली वायु, गुजावात, वृक्षों आदि को नष्ट करने वाली महावायु, घनोदधि वायु, धन वायु, तनुवायु, उदरस्थ वायु, विमान जिसके आधर से हैं, वह वायु, पृथ्वीतल के आश्रित वायु और त्रैलोक्य पाच्छादक वायु ये सर्व वायु इन्ही पवनों में अन्तर्भूत होतो हैं । ये सब भेद वायु काय के कहे गये हैं । वायु कायिक जीव इसी वायुकाय के प्राश्रित रहते हैं, ऐसा जानकर विद्वज्जनों को इन्हें अपनी प्रात्मा के सदृश समझ कर नित्य ही इनकी दया का प्रत्यनपूर्वक पालन करना चाहिए। बनस्पतिकायिक जीवों के भेद
असाधारण साधारण भेदाभ्यां जिनागमे ।। कीर्तिता द्विविधाः संक्षेपादनस्पति कायिकाः ॥१३३१॥ प्रत्येक द्विपकरास्ते साधारण तराङ्गिनः । उदकार्थश्च जीवोस्य सन्मूच्छिमति भेदलः ।।१३३२॥
EWERMAN
mment