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________________ अध्याय : पाठवां ] अब जलकायिक जीवों के मेवों का प्रतिपादन- . . अवश्यायजलं रात्रि पश्चिम प्रहरोभवम् । हिमाख्यं अलकायं च जलबन्धन सम्भवम् ।।१३१८॥ माहिकास्पं जलं घूमाकाराम्बु च हरज्जलम् । स्थूल विन्दु जलं चातुः सूक्ष्म बिन्दु जलं तथा ॥१३१६॥ शुद्धाम्बु चन्दु कान्तोस्थमुदकं निर्भरादिजम् । सामान्यम्बुघनास्याम्भोऽधि ब्रहरीघ वातजम् ।।१३२०॥ सरिस्कूपसरः कुण्ड निराब्धि हृदादयः । एष्वप्कायेषु सर्वेऽन्येऽतर्भवन्त्यम्बुकायिकाः ।।१३२१॥ एलानकाय सभेदान कायाश्रितान् बहून् । जोवान् विज्ञाय यत्नेन पालयस्वास्मवत्संवा ।।१३२२॥ रात्रि के पिछले पहर में उत्पन्न होने वाला प्रोस जल, हिम नाम का जलकाय, मेघ जलकाय, कोहरे का जल, धूम प्राकार (धुन्ध) जल, दाभ की अरणी पर स्थित जल, स्थूल बिन्दु जल, जल का, सूक्ष्म बिन्दु जल, शुद्ध जल, चन्द्रकान्त मरिग से उत्पन्न जल, सामान्य जल, धन जल (घनोदधि), द्रह जल, मेघ से उत्पन्न जल, धनवातज जल, नदी, कूप, तालाब, कुण्ड, भरना, समुद्र एवं सरोवर आदि सर्व जल का जालकाय में अन्तर्भाव होने से ये सब जलकायिक ही हैं। इन सब जलकाय के भेदों को तथा जल काय के प्राश्रित रहने वाले असंख्यात जीवों को अपनी आत्मा के सदृश जानकर प्रयत्न पूर्वक निरन्तर उनकी रक्षा करनी चाहिए । अग्निकायिक जीवों का वर्णन-- अङ्गाराणि ज्वलज्वालाचिोप शिखादिका । मुर्मरायोहिकार्षाग्निःमुद्धाग्निःशुद्धाग्निर्बहुभेद भाव।।१३२३॥ विस्पाताग्नि वनाग्नि सूर्यकान्सादि गोचरः । अग्नि सामान्य रूपाग्नि निधूमो वाडबादिजः ।।१३२४॥ नन्दीश्वर महाधूम कुण्डिका मुकुटादिजाः । अग्निकाया अमोचन्त भवन्त्य नलयोनिषु ॥१३२५॥ इमांस्तेजों मायन जीवस्तेिजःकायाश्रितापरान्। विदित्वा सर्वयत्नेन रक्षन्तु मुनयोऽनिशम् ।।१३२६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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