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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि चन्द्र प्रभोऽथ बेडर्य कोमणिः स्फटिको मरिणः । जलकान्तो मरिणः सूर्यकान्तश्च गैरिको मणिः ॥१३११॥ चन्दनः पद्मरागाख्यो मरिणमरकसाह्वयः । थको मोचो मरिणमसरणं पाषाणसंझकः ।१३१२।। एते दिशतिसभेदाः पृथ्वीकायमयात्मनाम् ।। खराख्यासां सुभव्यानां व्यायरिणभिर्गताः ॥१३१३।। प्रवाल, शर्करा, हीरा, शिला, उपल (पत्थर), कर्केतनमन्गि, रजकमरिण, चन्द्रप्रभमरिण, वैडूर्य मरिण, स्फटिक मरिण, जलकान्त मणि, सूर्यकान्त मरिण, गरिक मरिण, चन्दनमरिंग, पाराग, मरकतमणि, बकमरिण, मोचमारिण. बैमसृण और पाषण खर पृथ्वी स्वरूप पृथ्वीकायिक जीवों के ये बीस भेद भव्य जीवों के दया पालनार्थ गणधर देवों के द्वारा कहे गये हैं। पृथ्वीकायिक पृथ्वी से बने हुए पर्वत एवं प्रासादों आदि का वर्णन -- रत्नप्रभादयः सप्त पृथ्ख्यश्चत्य माखिलाः । मेधाः पर्थताः सर्वे वेदिकातोरणादयः ।।१३१४॥ त्रिलोकत्थ विमानानि जम्बाद्याः सकालागु माः।। नविद्य शसुराणां च प्रासादाः कमलानि च ॥१३१५॥ स्तूपरत्नाकराधाये पृथ्वीकायमयाश्च ते। सर्वे ह्यन्तर्भवन्त्येषु पृथ्वी भेदेषु नान्यथा ॥१३१६।। एसान्पृथ्वीमयान्जीयान् पृथ्वोकायाश्रितान् बहून्। सम्यग्ज्ञात्वा प्रयत्नेन . रक्षन्तु साधयोऽमिशम् ॥१३१७॥ रत्नप्रभा ग्रादि सातों पृथ्वीयां, सम्पूर्ण चैत्यवृक्ष, मेरु आदि सर्व पर्वत, वेदि. काएँ एवं तोरण आदि, बैलोक्य स्थित विमान, जम्बू आदि समस्त वृक्ष, मनुष्यों, विद्याधरों और देवों के प्रासाद, पन आदि सरोवरों में स्थित कमल, स्तूप और रत्ना कर प्रादि ये सब पृथ्वीकायमय हैं, और इन सबका अन्तर्भाव पृथ्वीकाय के भेदों में ही * होता है, अन्य में नहीं । पृथ्वीकाय के आश्रित रहने वाले इन सब पृथ्वीमय जीवों को भली प्रकार जान कर सज्जन पुरुषों को अहर्निश इनको रक्षा प्रयत्न पूर्वक करना चाहिये।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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