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अध्याय : पाठवा ]
[ ५६५ वनस्पतिकायिकों में उत्पन्न होने के लिये विग्रहगति में जा रहा है, उसे वनस्पति जीव कहते हैं। पंच स्थावरों के चार-चार भेद---- ..
एतेषां प्राकनो भेदः किञ्चित्प्रारणाश्रितो मतः । पृथ्व्यादीनां द्वितीयस्य केवल जीवदूरगः ।।१३०४॥ जोवयुक्तस्तृतीयश्च चतुर्थों भेद ईरितः ।। रयत प्राग्वपुर्षा भाविपृथ्व्याङ्गाय गच्छताम् ॥१३०५॥ . एतान् भेदान् बुधैर्ज्ञात्वा सचेतनानचेतनान् । पृथ्व्यादीनां सुरक्षायै कर्तव्यं यत्नमजता ॥१३०६॥
इन पंच स्थावरों के चार-चार भेदों में से प्रथम भेद किंचित जीव युक्त होता है । द्वितीय भेद मात्र अजीव होता है, तृतीय भेद जीव सहित होता है, और चतुर्थ भेद में जीद पूर्व शरीर को छोड़ कर पृथ्वी आदि. शरीर को धारण करने के लिये जाता है, अतः यह चेतन ही है । इस प्रकार विद्वानों के द्वारा कहे हुये भेदों में चेतन अचेतन भेदों को जानकर पृथ्वी आदि पंच स्थावरों की रक्षा के लिए यत्न करना चाहिए। अब पृथ्वीकाकिय जीवों में से मृदु पृथ्वीकायिक जीवों के भेदों का निरूपण----
मृत्तिका वालुका लोहं लवसं सागरादिजम् । सानं रूप्यं स्वर्ण च त्रिपुषः सीसकं तथा ॥१३०७॥ हिए गुलं हरितालं च मनः शिलाथ सस्यकम् । प्रजनं भ्रक चा वालुकामी हि षोडश ।।१३०८॥ भेदा मृदुपृथ्वी कायात्मनां प्रोक्ता जिनाममे ।
इदानी खर पृथ्वीनां भेदान् मण्यादिकान् ॥१३०६।। मिट्टी, बालुका, लोहा, समुद्र आदि में उत्पन्न होने वाला नमक, ताम्र, चांदी, स्वर्ण, विपुष (कथीर या रांगा) सोसा, हिंगुल, हरताल, मनः शिला, जस्ता, अञ्जन (नीला थूथा या सुरमा), अभ्रक और भोडल ये सोलह भेद जिनागम में कोमल पृथ्वीकायिक जीवों के कहे गये हैं, अब खर पृथ्वी के मणि आदि भेदों को कहते हैं । अब खर पृथ्वी के भेदों का निरूपण---
प्रथालं शर्करा वन शिलोपलं सप्तः परम् । कर्केतन मरिण म्ना रजकाल्यो मरिणस्ततः ।।१३१०॥