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________________ ५६४ } [ गो. प्र. चिन्तामरिण जिनेन्द्र भगवान ने जलकाय जीवों के जल, जलकाय, जलकायिक और जल जीव इस प्रकार चार भेद कहे हैं। लोगों के द्वारा प्रालित एवं कीचड़ सहित जलको जल कहते हैं । उष्ण निर्जीव जल को जलकाय, जलकाय युक्त जीव को जलकायिक तथा जलकाय में जन्म लेने के लिये जाते हुए विग्रहगति में स्थित जीव को जलजीव कहते हैं। पूर्ववत् तेजकाय जीवों के तेज, तेज काय, सेजकायिक और तेज जीव इस प्रकार चार भेद कहे हैं। भस्म से आच्छादित अग्नि को अर्थात् किञ्चित उग भरम को तेज कहते हैं । जिसमें से जीव निकलकर चला गया है, उस भस्मादि को तेज काय कहते हैं । तेजकाय सहित जीव को तेजकायिक और तेजनाम कर्म से युक्त जो जीव विग्रहगति में स्थित हैं, उन्हें विद्वानों में तेज जीव कहा है। वायु जीवों के वायु, वायुकाय, वायुकायिक और वायु जीव इस प्रकार चार भेद होते हैं । धूल पुज से युक्त भ्रमण करती हुई वायु (प्रांधियों) को जिनेन्द्र देव ने वायु कहा है । जीव से रहित पंखे प्रादि की पौगलिक वायु देह को वायुकाय कहते हैं। प्राण युक्त वायु को वायुकायिक और वायुगति में आने वाले विग्रह गति में स्थित जीव को वायु जीव कहते हैं । बनस्पति के चार भेद और उनके भिन्न-भिन्न लक्षण--- प्रादो वनस्पतिश्चाथ वनस्पति वपुस्ततः। वनस्पत्याचिकः काधिको वनस्पतिजीववाक् ॥१३००॥ वनस्पस्या अमी भेवाश्चत्वारः कोसिता जिनः । अन्तओवयुतो बाहत्यक्त जीवो बनस्पतिः ॥१३०१ वनस्पतिवपु स्मृतः छिन्नभिन्न तृणादिकम् । वनस्पस्पत्यङ्ग युक्तोऽङ गोस्याद्वनस्पतिकायिकः ॥१३०२।। प्राक्शरीर परित्यागे वनस्पत्यङ गसिद्धये ।। प्राणान्लेऽङगी गतिः गच्छन् स्यादन् स्याद्वनस्पति जीववाक् ॥१३०३।। वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक और वनस्पति जीव ऐसे वनस्पति के चार भेद जिनेन्द्र देव के द्वारा कहे गये हैं । अभ्यन्तर भाग जीव युक्त है और बाह्य भाग जीव रहित है, ऐसे वृक्ष आदि (कटे हुए हरे वृक्ष) को वनस्पति कहते हैं । दिन भिन्न किये हुए तृणादिक को वनस्पति काय माना गया है, जीव सहित वनस्पति काय को वनस्पतिकायक कहते हैं, और आयु के अन्त में पूर्व शरीर को त्याग कर जो जीन जानाaapseen
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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