________________
-RDASTI
५८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि श्रेषयामुपशमाख्यायां founi सजिलो बन्छ । त्रोणि संहननानि स्युरादिमानि दृढानि च ॥१४०४।। अपूर्व करणाल्ये वानिवृत्ति करणाभिषे । सूक्ष्मादि साम्परायाख्ये क्षीण कषाय नामनि ॥१४०५॥ सयोगे च गुणस्थानेऽत्राद्य संहननं भवेत् । केवलं क्षपक श्रेण्या रोहरण कृत योगिनाम् ॥१४०६॥ अयोगिजिन नाथानां देवानां नारकात्मनाम् । प्राहारक महर्षीणामेकाक्षाणां चषि च ।।१४०७॥ यानि कामरण कायानि बजतां परजन्मनि ।
तेषां सर्वशरीराणां नास्ति संहननं क्वचित् ॥१४०॥
म्लेच्छ मनुष्यों, विद्याधरों, मनुष्यों, संजी पञ्चेन्द्रिय तियंचों और कर्मभूमिज तिर्यञ्चों के छहों संहनन होते हैं । असंज्ञी तिर्यञ्चों के, विकलेन्द्रिय जीवों के और लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के अन्तिम असम्प्राप्तसृपाटिका नाम का छठवां अशुभ संहनन । होता है। वज्रमय वर्षभ, कीलें एवं अस्थि से युक्त और वज्रमय वेष्ठन से वेष्ठित पहला वज्रर्षभनाराच संहनन, वनमय नाराच ( कीलों ) व अस्थियों से युक्त दूसरा वननाराच संहनन और तीसरा संहनन है। ये तीनों संहनन परिहार विशुद्धि संयम से युक्त मुनिराजों के होते हैं । चौथा अर्धनाराच, पांचवां कोलक और छठवां मसम्प्राप्तसृपाटिका ये तीनों संहनन कार्यभूमिज द्रव्यवेदी स्त्रियों के होते हैं । भोगभूमिज मनुष्यों और स्त्रियों के आदि का एक उत्कृष्ट संहनन होता हैं। मिथ्यात्व गुरणस्थान, से लेकर सप्तम गुणस्थान पर्यन्त सात मुरणस्थानों में प्रवर्तमान जीवों के छहों संहनन । होते हैं। .
उपशम श्रेणीगत अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसापराय और उपशान्त कषाय भुरणस्थानों में प्रवर्तमान मुनिराजों के प्रादि के तीन दृढ़ संहननों में से कोई एक होता है । क्षपक श्रेणीगत अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मपिराय, क्षीणकषाय और सयोगकेवलि गुणस्थानों में प्रवर्तमान मुनिराजों के प्रादि का मात्र एक दजर्षभनाराच संहनन ही होता है।
अयोगी जिनों के, देवों के, नारकियों के, आहारक शरीरी महाऋषियों के एकेन्द्रिय जीवों के और आगामी पर्याय में जन्म लेने के लिए विग्रह गति में आने वाले।
-
m
-
maamwa