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________________ २९४ ] [ गो. प्र. चिन्तामरि भावार्थ - जैसे निर्मल दर्पण में पुरुष के समस्त अवयव और लक्षण दिखाई पड़ते हैं, उसी तरह परमात्मा के प्रदेश शरीर के श्रवयव रूप परिणत हैं और उनमें समस्त लक्षणों की तरह समस्त गुण रहते हैं । इत्यसौ सन्तताभ्यासवंशात्संजातनिश्चयः । अपि स्वप्नाद्यवस्थासु तमेवाध्यक्ष मोक्षते ॥ ६४८ ॥ इस प्रकार जिसके निरन्तर अभ्यास के वश में निश्चय हो गया है, ऐसा ध्यानी स्वप्नादिक अवस्था में भी उसी परमात्मा को प्रत्यक्ष देखता है । भावार्थ - दृढ़ अभ्यास से स्वप्नादिक में भी परमात्मा ही दिखाई पड़ता है । सोऽहं सकल वित्तार्थः सिद्धः साध्यो भवच्युतः । परमात्मा परं ज्योति विश्वदर्शी निरञ्जनः ॥ ६४६|| तदा निश्चशोऽनिलको fararat freफुरत्युच्चैर्घ्यानिध्यात् विवर्जितः ||६५०। पूर्वोक्त प्रकार से जब परमात्मा का निश्चय हो जाता है और दृढ़ अभ्यास से उसका प्रत्यक्ष होने लगता है, उस समय परमात्मा का चिन्तन इस प्रकार करे कि ऐसा परमात्मा में ही है, मैं ही सर्वज़ हूं, सर्व व्यापक हूँ, सिद्ध हूं, तथा मैं ही साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य था; संसार से रहित परमात्मा, परम ज्योति स्वरूप, समस्त विश्व का देखने वाला मैं ही हूं, मैं ही निरञ्जन हूं, ऐसा परमात्मा का ध्यान करे; उस समय अपना स्वरूप निश्चल, अमूर्त अर्थात् शरीर रहित, निष्कलङ्क, जगत् का गुरु, चैतन्य मात्र और ध्यान तथा ध्याता के भेद रहित ऐसा अतिशय स्कुरायमान होता है । पृथग्भावमतिक्रम तथैक्यं परमात्मनि । प्राप्नोति स मुनि: साक्षाद्यथान्यत्वं न बुध्यते ६५१ ।। यह मुनि जिस समय पूर्वोक्त प्रकार से परमात्मा का ध्यान करता है, उस समय परमात्मा में पृथक् भाव अर्थात् अलंगपने का उल्लंघन करके साक्षात् एकता को इस तरह प्राप्त हो जाता है कि जिससे पृथकूपने का बिल्कुल भाग नहीं होता । भावार्थ उन समय ध्याता और ध्येय में द्वैत भाव नहीं रहता । - निष्कलः परमात्माहं लोकालोकावभासकः । विश्वव्यापी स्वभावस्थो निकार परिवर्जितः । ६५२ ।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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