SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 382
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : पाँचवां । [ २६६ कर्मरहित परमात्मा का ध्यान कैसे किया जाय ? व्योमाकारमनाकारं निष्पन्न शान्तमच्युतम् । . चरमाङ्गास्कियन्यून स्वप्रदेशने स्थितम् ।।६४३॥ लोकानशिखरसासीनं शिवीभूतमनामयम् । पुरुषाकारमापन्नमध्यमूतं च चिन्तयेत ।।६४४॥ आकाणा के आकार अर्थात् अमूर्त, अनाकार अर्थात् पुद्गल के आकार से रहित, निष्पन्न अर्थात् फिर जिसमें किसी प्रकार की हीनाधिकला न हो, शान्त अर्थात् क्षोभ रहित, अच्युत अर्थात् जो अपने रूप से कभी च्युत न हो, चरम शरीर से किंचित् न्यून अर्थात् जिस शरीर से मोक्ष हुया है, उस शरीर से नासिकादि रन्ध्र प्रदेशों मे हीन, अपने घनीभूत प्रदेशों से स्थित तथा लोकांकाश के अग्रभाग में स्थित, शिवीभूत अर्थात् पहिले अकल्याए रूप से अब कल्याण रूप हुए ऐसे, अनामय अर्थात् रोगादिक मे सर्वथा रहित और पुरुषाकार को प्राप्त होकर भी अमूर्त अर्थात् अकार तो पुरुष का है, परन्तु तो भी उसमें रूप-रस-गन्ध-स्पादिक नहीं है। ऐसे परमात्मा का ध्यान इस रूपातीत ध्यान में करे । निष्कलस्य विशुद्धस्य निष्पन्नस्य जगद्गुरोः। चिदानन्दमयस्योच्चः कथं स्यात्पुरुषाकृतिः ॥६४५.६॥ जो परमात्मा निष्कल अर्थात् देह रहित है, विशुद्ध अर्थात् द्रव्यभाव रूप दोनों मलों से रहित है, निष्पन्न अर्थात् जिसमें कुछ हीनाधिकता होने वाली नहीं है, जो जगत का गुरु है और जो चिदानन्द स्वरूप अर्थात् चैतन्य और प्रानन्द स्वरूप है, महान् है, ऐसे परमात्मा के पुरुषाकृति अर्थात् पुरुष का आकार कैसे हो सकता है ? विनिर्गतमधूच्छिष्ट प्रतिमे मूषिकोदरे । यादग्गमन संस्थानं तदाकारं स्मरेद्विभुम् ।।६४६॥ जिससे मोम निकल गया है, ऐसी मूषिका के उदर में जैसा आकाश का नाकार है: तदाकार परमात्मा प्रभु का ध्यान करे । इसका दृष्टान्त क्या है ? सर्वावयवसम्पूर्ण सर्वलक्षणलक्षितम् । विशुद्धादर्शसड कान्त प्रतिबिम्ब समप्रभम् ॥६४७॥ समस्त अवयवों से पूर्ग और समस्त लक्षणों से लक्षित ऐसे निर्मल दर्पण में पढ़ते हुए प्रतिविम्ब के समान प्रभा बाले परमात्मा का चिन्तवन करे। . .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy