SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 381
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि . .... SATTA फिर किसी अन्य के शरण से रहित होकर ज्ञानी पुरुष उसी परमात्मा में लीन हो जावें । भावार्थ -- इस ध्यान में प्रथम तो गुरुग और गुणी का पृथक् रूप से विचार है, परन्तु अन्त में परमात्मा में लीन होने से ध्येय और ध्यानी पृथक् रूप न रहेंगे। सद्गुण ग्राम सम्पूर्ण तत्स्वभावकभावितः । कृत्वात्मानं ततो ध्यानी योजयेत्परमात्मनि ॥६४०॥ परमात्मा के स्वभाव से एक रूप भावित अर्थात् मिला हुया ध्यानीमुनि उस " परमात्मा के गुण समूहों से पूर्णरूप अपने प्रात्मा को करके फिर उसे परमात्मा में योजन करे, ऐसा विधान है । द्वयोगु गर्मत साम्यं व्यक्ति शक्ति व्यपेक्षया । विशुद्धलरयोः स्वात्मतत्त्वयोः परमागमे ॥६४१॥ परमागम में विशुद्ध अर्थात् कर्म रहित और उससे इतर अर्थात् कर्म सहित इन दोनों स्वात्मतत्वों में शक्ति और व्यक्ति की अपेक्षा से गुणों से समानता मानी है। भावार्थ - जब शक्ति और व्यक्ति को भिन्न-भिन्न मानते हैं, तब तो कर्म रहित विशुद्ध श्रात्मा व्यक्तिरूप से परमात्मा है और कर्म सहित आत्मा शक्ति रूप से परमात्मा है। और यदि शक्ति और व्यक्ति को अभिन्न मानते हैं तो दोनों ही समान हैं । यः प्रमाणनयन स्वतत्वमबबुद्धयते । बुद्धयते परमात्मानं स योगी बीतविभ्रमः ॥६४२।। जो मुनि प्रभाग और नयों के द्वारा अपने आत्मतत्व को जानता है, वहीं ... योगी बिना किसी सन्देह के परमात्मा को जानता है । भावार्थ - जब तक प्रमाण और नयों का स्वरूप तथा इनके द्वारा आत्मा का स्वरूप न जाना जायगा तब तक कर्म सहित ही आत्मा शक्ति की अपेक्षा से कर्म रहित है, वह विरोध भी दूर न हो सकेगा; इन दोनों का विरोध दूर करने वाला स्याद्वाद है। इसलिए स्याद्वाद को समझ कर फिर यदि इन दोनों का विचार करते है, तो कोई विरोध नहीं रहता और - न भ्रम ही रहता है । व कर्म रहित परमात्मा का स्वरूप कहते हैं कि जिसके द्वारा यह योगी अपने आत्मा को रूपातीत ध्यान में चिन्तवन करे -- : . .. . :
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy