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अध्याय : पाँचदां ]
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जो खोटे ध्यान करने वाले क्षुद्र योगी हैं, उनको इष्ट सिद्धियां कदापि नहीं होतीं, किन्तु उनके उलटी स्वार्थ की अनिवार्य हानि ही होती है । सम्बन्ध निरपेक्षा मुमुक्षवः ।
भवभव
न हि स्वप्नेऽपि विक्षिप्तं मनः कुर्वन्ति योगिनः ।। ६३५ ।।
जो मोक्षाभिलाषी योगीश्वर मुनि हैं, वे जिससे संसार की उत्पत्ति हो ऐसे सम्बन्धों से निरपेक्ष रहते हैं, वे अपने मन को स्वप्न में भी चलेयमान नहीं करते हैं । भावार्थ — उनको किसी प्रकार की ऋद्धि प्राप्त हो, कोई देवता याकर उनकी महिमा करे तथा किसी को ऋद्धिवान् देखे तो भी वे मोक्ष मार्ग स कदापि अपने मन को च्युत नहीं करते हैं ।
रूपातीत ध्यान कैसे किया जाय ?
श्रथ रूपे स्थिरीभूत चित्तः प्रक्षीणविभ्रमः -
श्रमसंमजमव्यक्तं ध्यातुं प्रक्रमते ततः ॥६३६॥
इसके पश्चात् रूपस्थ ध्यान में स्थिरीभूत है, चित्त जिसका तथा नष्ट हो गये हैं विभ्रम जिसके, ऐसा ध्यानी अमूर्त, अजन्मा, इन्द्रियों से अगोचर ऐसे परमात्मा के ध्यान का प्रारम्भ करता है ।
चिदानन्दमयं शुद्धममूर्तं परमाक्षरम् । स्मरेद्यत्रात्मनात्मानं तद्रूपातीत मिष्येते ॥ ६३७।।
जिस ध्यान में ध्यानी मुनिं चिदानन्दमय, शुद्ध, मूर्त, परमाक्षर रूप आत्मा को ग्रात्मा से ही स्मरण करे, अर्थात् ध्यावे सो रूपातीत ध्यान माना गया है । वदन्ति योगितो ध्यानं चित्तमेवमनाकुलम् |
कथं शिवत्वमापन्नमात्मानं संस्मरन्मुनिः ।। ६३८ ॥
योगीश्वर चित्त के आकुलता रहित होने अर्थात् क्षोभरहित होने को ही ध्यान कहते हैं। तो कोई मुनि मोक्ष प्राप्त आत्मा का स्मरण कैसे करें ? भावार्थजब ध्येय और ध्यानी पृथक-पृथक हैं तो चित्त को क्षोभ अवश्य होगा । विवेच्य तद्गुणग्रासं तत्स्वरूपं निरूप्य च ।
अनन्यशरण ज्ञानी तस्मिन्न ेव लयं व्रजेत् ॥६३९॥
प्रथम तो उस परमात्मा के गुण समूहों को पृथक्-पृथक् विचारे और फिर उन गुणों के समुदाय रूप परमात्मा को गुण गुणी के प्रभिन्न भाव से विचारे और