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[ गो. प्र. चिन्तामणि निर्भरानन्द सन्दोहपर संपादन क्षमम् । मुक्ति मार्ग मतिकम्य कः कुमार्ने प्रवर्त्तते ॥६३०॥
इस कारण अतिशय रूप प्रानन्द के समूह के स्थान को उत्पन्न करने में समर्थ ऐसे मोक्ष मार्ग (समीचीन ध्यान) को छोड़कर ऐसा कौन है जो कुमार्ग (खोटे ध्यान) में प्रवृत्ति करे, ज्ञानवान् तो कदापि नहीं करे ।
क्षुद्रध्यान पर प्रपञ्च चतुरा रागावलोद्दीपिताः, मुद्रामण्डल यन्त्र मन्त्र करणराराधयन्त्यादृताः । काम क्रोध वशीकृतानिह सुरान् संसार सौख्याथिनो, दुष्टाशाभिहताः पतन्ति नरके भोगातिभिर्वञ्चिताः ॥६३१॥
जो पुरुप खोटे ध्यान के उत्कृष्ट प्रपत्रों को विस्तार करने में चतुर हैं, बे इस लोक में राग रूप अग्नि से प्रज्वलित होकर मुद्रा, मंडल, यंत्र, मंत्र आदि साधनों के द्वारा काम, क्रोध से वशीभूत कुदेवों का आदर से आराधन करते हैं सो सांसारिफ सुख के चाहने वाले और दुष्ट आशा से पीडित तथा भोगों की पीड़ा से वंचित होकर वे नरक में पड़ते हैं, इस कारण कहते हैं कि-----
तद्धयेयं तदनुष्ठेयं तद्विचिन्त्यं मनीषिभिः । यज्जोब कर्म सम्बन्ध विश्लेषायैव जायते ॥६३२।।
वही बुद्धिमानों को ध्यान करने योग्य है और वहीं अनुष्ठान व चिन्तबन करने योग्य है, जो कि जीव और कर्मों के सम्बन्ध को दूर करने बाला हो; अर्थात् ।। जिस कार्य से कर्मों से मोक्ष हो, वही कार्य करना योग्य है ।
स्वयमेव हि सिद्धयन्ति सिद्धयः शान्तचेतसाम् ।
अनेक फल सम्पूर्ण मुक्ति मार्गावलम्बिनाम् ॥६३३॥ __जो मुनि शान्त चित हैं और मुक्ति मार्ग का अवलम्बन करने वाले हैं, उनके अनेक प्रकार के फलों से भरी हुई सिद्धियां स्वयमेव सिद्ध हो जाती हैं । भावार्थ समीचीन ध्यान से नानाप्रकार की ऋद्धियां विना चाहे ही सिद्ध हो जाती हैं। फिर खोटे प्राशय से खोटे ध्यान करने से क्या लाभ है ?
संभवन्ति न चाभीष्ट सिद्धयः क्षुद्रयोगीनाम् । भवत्येव पुनस्तेषां स्वार्थ भ्रंशोऽनिवारितः ॥६३४।।