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-nigamin
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अध्याय : पांचवा ]
[ २८६ - अनेक प्रकार की विकिया रूप असार ध्यान मार्ग का अवलम्बन करने वाले क्रोधी के भी ऐसी शक्ति उत्पन्न हो जाती है कि जिसका देव भी चिन्तवन नहीं कर सकते।
बहूनि कर्माणि मुनिप्रवीर विद्यानुवादात्प्रकटी कृतानि । असंख्य भेदानि कुतूहलार्थ. कुमार्गकुध्यानगतानि सन्ति ।।६२५।।
ज्ञानी मुनियों ने विद्यानुवाद पूर्व से असंख्य भेद वाले अनेक प्रकार के विद्वेषरण उच्चाटन आदि कर्म कौतुहल के लिये प्रकट किये हैं, परन्तु वे सब कुमार्ग और कुध्यान के अन्तर्गत है।
असावनन्त प्रथितप्रभावः स्वभावतो यद्यपि यन्त्रनाथः । नियुज्यमानः स पुनः समाधौ करोति विश्वं चरणाग्रलीनम् ॥६२६॥
यद्यपि यह प्रात्मा स्वभाव से ही अनन्त और जगत्प्रसिद्ध प्रभाव का धारक है; फिर समाधि (ध्यान) में जोड़ा हुअा तो यह समस्त जगत को अपने चरणों में लीन कर लेता है ।
स्वप्नेऽपि कौतुकेनापि नरसद्धयानानि योगिभिः । सेव्यानि यान्ति बोजत्वं यतः सन्मार्गहानये ॥६२७॥
परन्तु योगी मुनियों को चाहिये कि असमोचीन ध्यानों को कौतुक से स्वप्न में भी न विचार; क्योंकि असमीचीन ध्यान सन्सार्ग की हानि के लिये बीज स्वरूप (कारण) है भावार्थ-खोटे ध्यान से खोटा मार्ग ही चलता है, इस कारण मुनि जनों को बुरा ध्यान कदापि नहीं करना चाहिये ।
सन्मार्गाप्रच्युतं चेतः पुनवर्षशतैरपि । शक्यले न हि केनापि व्यवस्थापयितुं पथि ।।६२८॥
खोटे ध्यान के कारण सन्मार्ग से विचलित हुए चित्त को फिर सैकड़ों वर्षों में भी कोई सन्मार्ग में लाने को समर्थ नहीं हो सकता; इस कारण खोटा ध्यान कदापि नहीं करना चाहिये।
असद्धयानानि जायन्ते स्वनाशायैव केवलम् । रागाद्यसद्ग्रहावेशात्कौतुकेन कृतान्यपि ॥६२६ ।।।
असमीचीन (खोटे) ध्यान कौतुक मात्र से किये हुये भी रागादि रूप खोटे ग्रहों के प्रांवेश से केवल अपने नाश के लिये ही होते हैं।