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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
त्रैलोक्यनन्दबीजं जनन जलनिधेर्यान पात्रं पवित्रं, लोकालोक प्रदीपं स्फुरद मलशरच्चन्द्र कोटि प्रभादयम् । कस्यामप्यग्र कोटी जगदखिलमतिक्रम्य लब्धप्रतिष्ठ देवं farastra शिवमजमनघं वीतरागं भजस्व ॥ ६२१॥ .
हे मुने, तू वीतराग देव का ही ध्यान कर कैसे हैं वीतराग भगवान ? तीनों लोकों के जीवों को आनन्द के कारण हैं, संसाररूप समुद्र के पार होने के लिये जहाज तुल्य हैं तथा पवित्र, अर्थात् द्रव्यभाव मल से रहित हैं तथा लोक-ग्रलोक के प्रकाश करने के लिये दीपक के समान हैं और प्रकाशमान तथा निर्मल ऐसे जो करोड़ शरद के चन्द्रमा उनकी प्रभा से अधिक प्रभा के धारक हैं तथा किसी मुख्य कोटि में समस्त जगत का उल्लंघन कर पाई है, प्रतिष्ठा जिन्होंने ऐसे हैं जगत के श्रद्वितीय नाथ हैं, शिवस्वरूप हैं, अजन्मा है, पापरहित हैं, ऐसे वीतराग भगवान का ध्यान करो |
. इस प्रकार रूपस्थ ध्यान का वर्णन किया । इसमें अरहन्त सर्वज्ञ सर्व अतिशयों से पूर्ण का ध्यान करना कहा है, उसी के अभ्यास से समय लोकर, उसके समान अपने आत्मा को ध्यावना, जिससे वैसा ही हो जाता है, इस प्रकार वर्णन किया । * रूपातीत ध्यान का वर्णन *
रुपातीत ध्यान किस प्रकार किया जाय ?
वीतरागं स्मरन्योगी वीतरागी विमुच्यते । रागी सराग मालम्व्यं क्रूरकर्माश्रितो भवेत् ॥ ६२२ ध्यान करने वाला योगी वीतराग का ध्यान करता हुआ वीतराग होकर कर्मों से छूट जाता है और रागी का लंम्बन करके ध्यान करने से रागी होकर क्रूर कमों के प्राश्रित हो जाता है, अर्थात् अशुभ कर्मों से मंत्र जाता है ।
मन्त्र मण्डल मुद्रादि प्रयोगंर्ध्यातुमुद्यतः ।
सुरासुरनरनातं क्षोभयत्यखिलं क्षरगात् ।। ६२३ ।।
यदि ध्यानी मुनि मन्त्र, मंडल, मुद्रादि प्रयोगों से ध्यान करने में उद्यत हो तो समस्त सुर, असुर और मनुष्यों के समूह को क्षण मात्र में क्षोभित कर सकता है। क्रस्याप्यस्य सामर्थ्यमचिन्त्यं त्रिदशैरपि ।
अनेक विक्रिया सार ध्यान मार्गावलम्बिनः ।। ६२४ ॥