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अध्याय : पांचवां
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ही चित्त को प्रवेश कराके उसी भाव से भावित योगी मुनि उसी की तन्मयता को प्राप्त होता है।
यदाभ्यासवशात्तस्य तन्मयत्वं प्रजायते । तदात्मानमसौ ज्ञानी सर्वशीभूत मीक्षते ।।६१६॥
जव अभ्यास के वशं से उस मुनि के उस सर्वज्ञ के स्वरूप से तन्मयता उत्पन्न · होती हैं, उस समय वह मुनि अपने असर्वज्ञ प्रात्मा को सर्वज्ञ स्वरूप देखता है। .
एष देवः स सर्वज्ञः सोऽहं तद पता मतः । तस्मात्स एव नान्योऽहं विश्वदर्शोप्ति मन्यते ॥६१७॥ .
जिस समय सर्वेज स्वरूप अपने को देखता हैं, उस समय ऐसा मानता है कि यह वही सर्वज्ञदेव है, वहीं तत्स्वरूपता को प्राप्त हुअा मैं हूं, इस कारण वहीं सर्व का देखने वाला मैं हूं, अन्य मैं नहीं हूं, ऐसा मानता है ।
येन येन हि भावेन युज्यते यन्त्रवाहकः । तेन तन्मयतां याति विश्वरूपो मरिणर्यया ॥६१८।।
जिस-जिस भाव से यह यंत्र वाहक (जीव) जुड़ता है, उस-उस भाव से तन्मयता को प्राप्त होता है, जैसे निर्मल स्फटिक मरिण जिस वर्ण से युक्त होता है, वैसा ही वर्ण स्वरूप हो जाता है।
भव्यतैव हि भूतानां साक्षान्मुक्ते. निबन्धनम् । अतः सर्वज्ञता भध्ये भवन्ती नात्र शङ्कयते ॥६१६।।
अथवा इस प्रकार है कि जीवों के भन्यत्व भाव है सो साक्षात मुक्ति का कारण है, इस कारगा भव्य प्राणी में सर्वज्ञता होने में संदेह नहीं करना अर्थात् भव्य के निःसंदेह सर्वज्ञता होती ही है।
अयमात्मा स्वसामा द्विशुद्धयति न केवलम् । चालयत्यपि संकद्धो भुवनानि चतुर्दश ।।६२०॥
यह आत्मा अपने सामर्थ्य से केवल विशुद्ध ही नहीं होता है, किन्तु जो क्रोधरूप होता है तो चौदह भुवनों को (लोकों को भी चला देता है। भावार्थ-पात्मा की अचिन्त्य सामर्थ्य है कि जो पाप सर्वज्ञ के ध्यान से तन्मय होता है तो सर्वज्ञ हो जाता है और किसी समय यदि क्रोध से तन्मय हो जाय तो चौदह भुवनों को चला देता है। ..
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