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________________ SHARE [ गो. प्र. चिन्तामणि ऐसा श्री वीर जिनेन्द्र मन को निश्चल करके ध्यान करने योग्य (ध्येय) है; अन्य कल्पित ध्येय (ध्यान करने योग्य नहीं है। तस्मिनिरन्तराभ्यास वशात्संजात निश्चलाः । सर्वावस्थासु. पश्यन्ति तमेव परमेष्ठिनम् ॥६१०॥ उस सर्वज्ञदेव के ध्यान में अभ्यास करने के प्रभाव से निश्चल हुए योगींगरण सर्व अवस्थाओं में उसी परमेष्ठी को देखते हैं । तदालम्ब्य परं ज्योतिस्तद गरण ग्रामरजितः । . अविक्षिप्तमना योगी तत्स्वरूप मुपाश्नुते ॥६११॥ . . योगी (ध्यानी मुनि) उस सर्वज्ञदेव परम ज्योति का पालवन करके उसके .. गुगा ग्रामों में रंजायमान होता हुआ मन में विक्षेप रहित होकर उसी स्वरूप को प्राप्त होता है। इत्थं तद्भावनानन्द सुधास्यन्दाभिनन्दितः। नहि स्वप्नाद्यवस्थासु ध्यायन्प्रच्यवते मुनिः ।।६१२॥ इस प्रकार उस सर्वज्ञ देव की भावना से उत्पन्न हुए आनन्दरूप ग्रंमृत के वेग से प्रानन्दरूप हुआ मुनि स्वप्नादिक अवस्थानों में भी ध्यान से च्युत नहीं होता। तस्य लोकत्रयश्वयं ज्ञानराज्यं स्वभावजम् । ज्ञानत्रयजुषां मन्ये योगि नामप्य गोचरम् ।।६१३॥ जो उस सर्वनदेव के तीन लोक का ईश्वरत्व हैं, स्वभाव से उत्पन्न ज्ञान का राज्य है, वह मति श्रुत अवधि इन तीत ज्ञान सहित योगी मुनियों के भी अगोचर है, ऐसा मैं मानता हूं। साक्षानिविषयं कृत्वा साक्ष चेतः सुसंयमी। नियोजयत्य विश्रान्तं तस्मिन्न व जगदगुरौ ।।६१४।। यद्यपि सर्वज्ञ देव का रूप छद्मस्थ ज्ञानी के अगोचर हैं तथापि इन्द्रिय और मन को अन्य विषयों से हटाकर मुसंयमी मुनि निरन्तर साक्षात् उसी भगवान् के स्वरूप में अपने मन को लगाता है । सद्गुराग्राम . . .संलीन मानसस्तद्गताशयः । तभाब भांवित्तो योगी तन्मयत्वं प्रपद्यते ॥६१५॥ उस परमात्मा में मन लगावे तब उसके ही गलों में लीन चित्त होकर उसमें
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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