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________________ अध्याय : पांचवां ] है, देवों का देव है, जिनेश्वर है । तथा समस्त लोक को देखने वा दिखाने को नेत्र समान है जगत के वंदने योग्य है, योगियों का नाथ है, महेश्वर है, ज्योतिर्मय (ज्ञान प्रकाश .... . मय) है, आदि अन्त रहित है, सबका रक्षक है, तीन भुवन का ईश्वर हैं । योगोश्वर है, ईशान है, अादि देव है, जगद् गुरु है, अनन्त है, अच्युत है, शान्त है, तेजस्वी है, भूतनायक है, सन्मति है, सुगत है, सिद्ध हैं, जगत् में ज्येष्ठ है, पितामह है, महावीर है, मुनिश्रेष्ठ है, पवित्र है, घरमाक्षर है, सर्वन , सबका दाता है. सर्व हितरि है. वर्द्धमान है, निरामय (रोग रहित) है, नित्य है, अव्यय (नाण रहित) है, अव्यक्त है, परिपूर्ण है, पुरातन है - इत्यादिक. अनेक सार्थ पवित्र नाम सहित, सर्वगत, देवों का नायक, . सर्वज्ञ जो वीर तीर्थङ्कर है, उसका हे मुने ! तू स्मरण कर । ..... इस प्रकार दोप रहित, सर्वज्ञ देव, अरहत जिनदेव का ही ध्यान करना चाहिये; अन्यमति गुण रहित. दोष सहित को सर्वज्ञ कहते हैं, सो नाममात्र है, कल्पित है, वह सर्वज ध्यान करने योग्य नहीं है । अनन्यशरणं साक्षात्तत्सलीनेक मानसः । तत्स्वरूपमवाप्नोति ध्यानी तन्मयतां गतः ॥६०६।। उपयुक्त सर्वज्ञदेव का ध्यान करने वाला ध्यानी अन्य शरण से रहित हो साक्षात् उसमें ही संलीन है, मन जिसका ऐसा हो, तन्मयता को पाकर, उसी स्वरूप को प्राप्त होता है। यमाराध्य शिवं प्राप्ता योगिनो जन्म निस्पृहाः । यं स्मरन्त्यनिशं भव्याः शिवश्री संगमोत्सुकाः ॥६०७।। यस्य वागमतस्यकामासाद्य करिणकामपि । शाश्वते पथि तिष्ठन्ति प्रागिनः प्रास्तकल्मषाः ॥६०८॥ देव देवः स ईशानो भच्याम्भोजैक भास्करः । ... ध्येयः सर्वात्मनर वीरः निश्चलीकृत्य मानसम् ॥६०६॥ जिस सर्वज्ञदेव का पाराधन करके संसार से निःस्पृह मुनिगरा मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, तथा मोक्ष लक्ष्मी के संगम में उत्सुक भध्यजीव जिसका निरन्तर ध्यान .. ! करते हैं । तथा जिनके वचनरूपी अमृत की एक करिएका मात्र को पाकर संसारी . . जीव कल्मष (मिथ्यात्व पापों) को नष्ट करके शाश्वत मोक्षमार्ग में तिष्ठते हैं । सो देवों का देव, ईशान, भव्यजीव रूप कमलों को प्रफुल्लित करने के लिए मूर्य समान ...
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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