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अध्याय : पांचवां ]
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निष्कल अर्थात् लोक और लोक को देखने और जानने वाला, विश्व में व्यापक, स्वभाव में स्थिर समस्त विकारों से रहित ऐसा परमात्मा मैं हूँ ऐसा अन्य ग्रन्थों में भी अभेद भाव दिखाया है ।
इति विगल विकल्पं क्षोणरागादि दोषं, विदितसकल वेद्य व्यक्तविश्व प्रपञ्चम् 1: शिवमजनयद्य विश्व लोकंकनाथं,
परमपुरुषमुच्चे
र्भावशुद्धया भजस्व ॥ ६५३ ॥
यहाँ साचार्य विशेष उपदेश रूप प्रेरणा करते हैं कि हे मुने, इस प्रकार जिसके समस्त विकल्प दूर हो गए हैं, जिसके रागादिक सत्र दोष क्षीण हो गए हैं, जो जानने योग्य समस्त पदार्थों का जानने वाला है, जिसने संसार के समस्त प्रपञ्च छोड़ दिये हैं, जो शिव अर्थात् कल्याण स्वरूप अथवा मोक्ष स्वरूप है, जो ग्रेज प्रर्थात् जिसको ग्रागे जन्म मरण नहीं करना है, जो अनयद्य सर्थात् पापों से रहित है तथा जो समस्त लोक का एक अद्वितीय नाथ है, ऐसे परम पुरुष परमात्मा की भावों की शुद्धतापूर्वक अतिशय करके भज | भावार्थ- शुद्ध भावों से ऐसे परम पुरुष परमात्मा का ध्यान
कर |
इस प्रकार रूपातीत ध्यान का निरूपण किया। इसका संक्षेप भावार्थ यह है कि जब व्यानी सिद्ध परमेष्ठी के ध्यान का अभ्यास करके शक्ति की अपेक्षा से आपको भी उनके समान जानकर और आपको उनके समान व्यक्तरूप करने के लिये उस (आप) में लीन होता है, तब थाप कर्म का नाश कर व्यक्त रूप सिद्ध परमेष्ठी होता है ।
* धर्मध्यान का फल वर्णन *
ध्यान का विशेष फल -
प्रसीद शान्ति व्रज सन्निरुद्धयतां दुरन्तजन्मज्वर जिह्नितं मनः । श्रगाधजन्माण व पारवत्तनां यदि श्रियं वाञ्छसि विश्व दर्शिनाम् ||६५४।।
हे ग्रात्मन् यदि तू अगाध संसाररूपी समुद्र के पावर्त्ती और समस्त लोका लोक के देखने वाले ऐसे अरहन्त और सिद्ध भगवान् की लक्ष्मी की इच्छा करता है तो प्रसन्न हो, प्रान्तता धारण कर और दुरन्त संसाररूप ज्वर के मूर्च्छित मन को वश कर