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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
भावार्थ - प्राचार्य का उपदेश है कि यदि तू ध्यान करना चाहता है तो प्रथम ही अपने मन को वश में कर और शान्तभाव धारण कर ।
यदि रोड न शक्नोति तुच्छवीर्यो मुनिर्मनः ।
तदा रागेतरध्वंसं कृत्वा कुर्यात्सुनिश्चलम् ||६५५ ।।
और तुच्छवीर्य मुनि अर्थात् सामर्थ्यहीन मुनि यदि अपने कर सके तो रागद्वेष का नाश करके मन को निश्चल करे । भावार्थ रूप परिणत न होने दे ।
अक्षाश्च धर्मस्य स्युः सदैव निबन्धनम् ।
वित्तं भूमौ स्थिरीकृत्य स्व स्वरूपं निरूपय ।। ६५६॥ हे मुने ! ग्रनित्य
का
है
शरणादिकं बारह अनुप्रेक्षा अर्थात् अनित्यादिक का चिन्तवन करना सदा धर्म अपनी चित्तरूपी भूमि में उन अनुप्रेक्षात्रों को स्थिर करके अपने स्वरूप का अवलोकन कर । भावार्थ - यदि तेरा चित्त स्थिर न होता हो तो बारह भावनाओं का चिन्तवन कर, ये भावनायें धर्मध्यान में कारण हैं ।
मन को धश नहीं मन को रागद्वेष
स्फोटयत्याशु frostri यथा दीपोधनं तमः
तथा कर्मकलङ्कीधं मुनेध्यानं सुनिश्चलम् || ६५७ ॥
जैसे निष्क्रम्प अर्थात् अचल दीपक सघन अन्धकार को शीघ्र ही दूर कर देता है; उसी तरह मुनि का निश्चल ध्यान भी कर्मकलंक के समूह को शीघ्र ही नाश करता है । भावार्थ - कर्म के नाश करने के लिये ध्यान करना ही चाहिये । चलत्येवाल्प सत्त्वानां क्रियमाणमपि स्थिरम् । चेतः शरीरिणां शश्वद्विषयैर्व्याकुली कृतम् ||६५८ ॥ न स्वामित्वमतः शुक्ले विद्यतेऽत्यल्पचेतसाम् । प्रसंहननस्यैव तत्प्ररणीत पुरातनः ।।६५६|| छिन्ने भिन्ते हते दग्धे स्वमिव प्रपश्यत् वर्षचातादि दुःखैरपि न
दूरगम् ।
कम्पते ।।६६०||
न पश्यति तदा किञ्चन्न शृणेति न जिनति । स्पृष्टं किञ्चिन्न जानाति साक्षानिवृत्त लेपयत् ।।६६१।।