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________________ Esamagranepan अध्याय : पांचवां न [. २६७ . अरूपवीय अर्थात् सामर्थ्यहीन प्राणियों का मन स्थिर करते हुए भी निरन्तर विषयों से व्याकुल होता हुआ चलायमान होता ही है; इसलिये अतिशय अल्प चित्त वालों का शुक्लध्यान करने में अधिकार नहीं है। प्राचीन मुनियों ने पहिले के (वनवृषभनाराच) संहनन के ही शुक्लध्यान कहा है । इसका कारण यह है कि इस संहनन वाले का ही चित्त ऐसा होता है कि शरीर को छेदने, भेदने, मारने और जलाने पर भी अपने प्रात्मा को उस शरीर से अत्यन्त दूर अर्थात् भिन्न देखता हुआ चलायमान नहीं होता, और न वर्षाकाल के पवन आदिक दुःखों से चलायमान होता है तथा उस. ध्यान के समय लेप की मूर्ति अर्थात् रंग से निकाली हुई चित्राम की मूति की तरह हो जाता है। इस कारगा यह योगी न तो कुछ देखता है, न कुछ सुनता है, न कुछ सूघता है और न कुछ स्पर्श किये हुए को जानता है । . सकार्य-से पुरुष के शुक्ल ध्यान होता है । श्राद्य संहननोपेता निर्वेदपदवीं श्रिताः । कुर्वन्ति निश्चलं चेतः शुक्लध्यानक्षम नराः ॥६६२।। जिनके प्रादि का संहनन है और जो वैराग्य पदवी को प्राप्त हुए हैं, ऐसे. . पुरुष ही अपने चित्त को शुक्ल ध्यान करने में समर्थ है ऐसा निश्चल करते हैं। सामग्रयोरुभयोातानं बाह्यान्तरङ्गयोः । पूर्वयोरेव शुक्लं स्थानान्यथा जन्मकोटिषु ।।६६३।। इस प्रकार पूर्व कही हुई बाह्य और आभ्यन्तर अर्थात् आदि के संहनन और वैराग्य भाव इन दोनों सामग्रियों से ध्यान करने वाले के शुक्ल ध्यान होता है; अन्यथा अर्थात् बिना आदि के संहनन और वैराग्य भाव के, करोड़ों जन्मों में भी नहीं हो सकता। अतिक्रम्य शरीरादि सङ्गानात्मन्यवस्थितः । नवाक्षमनसा योग करोत्येकाग्रताश्रितः ॥६६४॥ धर्म ध्यान करने वाला शरीरादिक परिग्रहों को छोड़ पात्मा में अवस्थित होता हुअा, एकाग्रता को धारण कर, इन्द्रिय और मन का संयोग नहीं करता है: अर्थात् इन्द्रियों से जो पदार्थों का ग्रहरण होता है, उनका मन से संयोग नहीं करता मन को केवल स्वरूप में ही स्थिर रखता है। remensitings
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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