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इस ध्यान का फल ----
[ गो. प्र. चिन्तामणि
असंख्येयम संख्येयं क्षीयते क्षपकस्यैव
दृष्ट यादिगुणेऽपि च । कर्म जात मनुक्रमात् ||६६५ ।।
शमकस्य क्रमात् कर्म शान्तिमायाति पूर्ववत् । प्राप्नोति निर्मातङ्गः स सौख्यं शम लक्षणम् ।।६६६ ।।
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इस धर्म ध्यान में कर्मो का क्षय करने वाला क्षपक के सदृष्टि अर्थात् सम्यदृष्टि नामक चौथे गुस स्थान से लेकर सातवें अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त अनुक्रम असंख्यात असंख्यात गुण कर्म का समूह क्षय होता है; और जो कर्मों का उपशम करने वाला उपसंयक है, उसके असंख्यात गुणा कर्म का समूह उपशम होता है; इसलिये ऐसा धर्म ध्यानी आतंक दहादि दुःखों से रहित होता हुआ उपशम भाव रूप सुख को प्राप्त होता है ।
ध्यानस्य विज्ञेया स्थिति रान्त मुहूतिको
arita शमिको भावो लेश्या शक्लेव शाश्वती ।।६६७॥
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इस धर्म ध्यान की स्थिति अन्त मुहूर्त है, इसका भाव क्षायोपशमिक है और लेश्या सदा शुक्ल ही रहती है ।
भावार्थ - धर्म ध्यान अन्तर्मुहूर्त्त रहता है । धर्म ध्यान वाले क्षायोपशमिक भाव और शुक्ल लेश्या होती है । इदमत्यन्त निवेंद विवेक प्रशमोद्भवम् । स्वात्मानुभवमत्यक्षं पोलयत्यङ्गिनां सुखम् ||६६८।।
यह धर्म ध्यान जीवों को अत्यन्त निर्वेद अर्थात् संसार देह भोगादिकों से अत्यन्त वैराग्य तथा विवेक अर्थात् भेद ज्ञान और प्रथम ग्रर्थात् मंद कषाय इनसे उत्पन्न होने वाले अपने श्रात्मा के ही अनुभव में ग्राने वाले इन्द्रियों से प्रतीत अर्थात् श्रतीन्द्रिय ऐसे सुख को प्राप्त करता है ।
अलौल्य मारोग्यमनिष्ठुरत्वं गन्धः शुभो सूत्र पुरोषमल्पम् । कान्तिः प्रसादः स्वर सौम्यता च योग प्रवृतेः प्रथमं हि चिह्नम् ॥६६६ ॥ ● अर्थात् विषयों में इन्द्रियों की संतान होना और मन का चपल न होना, आरोग्य अर्थात् शरीर नीरोग होना, निष्ठुरता न होना, शरीर का गंध शुभ होना, मल मूत्र का अल्प होना, शरीर कान्ति सहित होना अर्थात् शक्तिहीन न होना