________________
Pacinginnisimam
अध्याय : पांचवां ]
m ytewasiunicine
nirneshwinikranamitrintentiness
चित्त का प्रसन्न होना अर्थात् खेदं शोबादिक मलिन भाव रूप न होना, और स्वर अर्थात शब्दों का उच्चारण सौम्य होना, ये चिह्न योग की प्रवृत्ति के अर्थात् ध्यान करने वाले के प्रारम्भ दशा में होते हैं ।
भावार्थ - ऐसे चिह्न वाले पुरुष के ध्यान का प्रारम्भ होता है। अथावसाने स्वतनु विहाय ध्यानेन संन्यस्तसमस्तसङ्गाः। ग्रे चेयकानुत्तर पुण्य बासे सर्वार्थसिद्धौ च भवन्ति भव्याः ॥६७०॥
जो भव्य पुरुष इस पर्याय के अन्त समय में समस्त परिग्रहों को छोड़कर, धर्म ध्यान से अपना शरीर छोड़ते हैं, वे पुरुष पुण्य के स्थान रूप ऐसे अवेयक और अनुत्तर विमानों में तथा सर्वार्थसिद्धि में उत्पन्न होते हैं।
___ भावार्थ -यदि परिग्रह का त्याग कर मुनि हो, धर्म ध्यान से इस पर्याय को छोड़े तो नव ग्रेवेयक, नव अनुत्तर और सर्वार्थसिद्धि में उत्तम देव हो ।
तत्रात्यन्त महाप्रभाव कलितं लावण्य लीलान्वितं । स्त्रग्भूषाम्बर दिव्य लाञ्छनचितं चन्द्रावदा वपुः॥ समात्योन्नत बीर्य बोध सुभगं काम ज्वरात्तिच्युतं । ... सेवन्ते बिगतान्तरायमतुलं सौख्यं चिरं गिरणः ॥६७१॥ .
जो जीव धर्म ध्यान के प्रभाव से स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं, वे वहां अत्यन्त महा प्रभाव सहित, सुन्दरता और क्रीडायुक्त तथा माला, - भूषण, वस्त्र और दिव्य लक्षणादि सहित, चन्द्रमा सदश शुक्लवर्ण शरीर को पाकर, उन्नत वीर्य और ज्ञान से सुभग, काम ज्वर की वेदना से रहित और अन्तराय रहिला ऐसे अतुल सुखों को चिरकाल पर्यन्त भोगते हैं।
अवेयकानुत्तरवास भाजां : वीचार हीनं सुखमत्युदारम् । निरन्तरं पुण्य परम्पराभिविवर्तते वादिरिवेन्दुपाः ।।६७२१॥
येयका और अनुतरादि विमानों में रहने वाले देवों का सुख काम सेवन से रहित होता है, अर्थात् उनके काम सेवन सर्वथा नहीं है तथापि उनका मुख अत्यन्त उदार है; और वह जैसे चन्द्रमा की किरणों से समुद्र बढ़ता है, वैसे ही निरन्तर पुण्य की परम्परा से बढ़ता ही रहता है।
भावार्थ---वहाँ का सुख वृद्धि रूप है ।
ल
"...
A