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[ गो. प्र. चिन्तामगि
. देवराज्यं समासाद्य यत्सुखं कल्पवासिनाम् । . निर्विशान्ति ततोऽनन्तं सौख्यं कल्पातित्तिनः ॥६७३॥
इन्द्र पद को पाने पर कल्पवासियों को जो सुख मिलता है, उससे अनन्त गुरगा सुख कल्पातीतो (नव वेयक, नव अनुत्तर और विजयादिक पांच विमानों में रहने वाले अहमिन्द्रों) को प्राप्त होता है। . . संभवत्यथ फल्पेषु तेष्वचिन्त्यविभूतिधम् । .
प्राप्तुवन्ति पर सौख्यं सुराःस्त्रीभोग लाञ्छितम् ।।६७४।।
अथवा धर्म ध्यान से पर्याय छोड़कर, जो उन कल्पस्वर्गों (सोलह स्वर्गो) में उत्पन्न होते हैं, वे देव भी अचिन्त्य विभुति के देने वाले और स्त्रियों के भोगों सहित उत्कृष्ट सुख को प्राप्त होते हैं ।
दशाङ्ग भोग सम्भूतं महाष्टगुण बद्धितम् । यत्कल्प बासिनो सौख्यां तदक्तु केन. पार्यते ॥६७५।।
कल्पवासी देवों का सुख दशाङ्ग भोगों से उत्पन्न हुआ है और अणिमादिक पाठ महा गुणों से बढ़ा हुआ है। इसलिये उस सुख का कौन वर्णन कर सकता है । .
सर्वद्वन्द्व विनिमुक्तं सर्वाभ्युदय भूषितम् ।। नित्योत्सवयुत्तं दिव्यं दिवि सौख्य दिवौकसाम् ॥६७६॥
स्वर्ग में देवों का सुख सर्वद्वन्द अर्थात् क्षोभों से रहित है, समस्त अभ्युदयों से भूषित, नित्य उत्सवों सहित और दिव्य है। :
प्रति समयमुदीर्ण स्वर्ग साम्राज्यरूढं । सकल विषय बीजं . स्वान्तदत्ताभिनन्दम् ॥ ललित युवति लीलालिङ्गनादिः प्रसूतं । सुखमतुल मुदार स्वागणो . निविशन्ति ॥६७७॥
स्वर्ग के देव प्रत्येक समय में उदय रूप अर्थात् विच्छेद रहित, स्वर्ग के साम्राज्य से प्रसिद्ध, समस्त विषयों का कारण, अन्त: करण को श्रानन्द देने वाले, सुन्दर देवाङ्गनाओं को लीला और प्रालिंगनादिक से उत्पन्न, अतुल और उदार सुख का अनुभव करते हैं। .. ... सर्वाभिमत भावोत्थं निविघ्नं स्वः सुखामृतम् । .. .
सेव्यमाना न बुद्धयन्ते गतं जन्म दिवौकसः ॥६७८।।
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