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________________ अध्याय : पांचवां । स्वर्ग निवासी देव अपने समस्त मनोवांछित पदार्थों में उत्पन्न और निर्विघ्न ऐसे स्वर्ग के सुख रूप अमृत का सेवन करते हुए व्यतीत हुए जन्ग को अर्थात् गई हुई देव पर्याय को नहीं जानते । तस्माच्च्युत्वा त्रिदिवपटलाछिय भोगावसाने । कुर्वन्त्यस्यां भुवि नरनुते पुण्य वंशेऽवतारम् ।। तश्वर्य परमवपुषं प्रातः देदोरगीत ..-- भौगनित्योत्सव परिस्गत ल्यमाना वसन्ति ॥६७६।। . फिर वे स्वर्ग के देव दिव्य भोगों को भोग कर, उस स्वर्ग पटल से च्युत होते हैं और इस भूमंडल में जिसको लोग नमस्कार करते हैं ऐसे उत्तम पुण्य बंश में अवतार लेते हैं, और वहाँ भी परम (उत्कृष्ट ) शरीर और ऐश्वर्य को पाकर, नित्य उत्सव रूप परिणत ऐसे देवोपनीत अनेक भोगों से लालित और पुष्ट हुए निवास करते हैं; यह . सब धर्म ध्यान का फल है । . ततो विवेक मालम्ब्य विरज्य जननभ्रमात् । त्रिरत्मशुद्धिमासाद्य तपः कृत्वात्य दुष्करम् ॥६८०॥ . धर्मध्यानं च शुक्लं च स्वीकृत्य निजवीर्यतः । कृत्स्नकर्म क्षगं कृत्वा व्रजन्ति पदम व्ययम् ॥६८१॥ उसके बाद अर्थात् उत्तम मनुष्य भव के सुख भोग कर, पुनः भेद ज्ञान (शरीरादिक्र से प्रात्मा को भिन्नता) को अवलम्बन कर, संसार के परिभ्रमण से विरक्त हो, रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र की शुद्धता को प्राप्त कर, दुर्धर तप कर तथा अपनी शक्ति के अनुसार धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान को धारण कर और समस्त कमों का नाश कर, अविनाशी मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं, यह धर्म ध्यान का परंपरारूप फल है। इस प्रकार धर्म ध्यान का फल निरूपण किया । ___ ध्यान का वर्णन शुभचन्द्राचार्य कृत ज्ञानर्णय से लिया है । चतुर्विशतिस्तव का लक्षण उसहादिजिरगवराणं णामणित्ति गुणाणुकित्ति च । काऊण प्रच्चिदूरण य तिसुद्धिपणमो थवोरणेओ ॥६८२॥ ऋषभ, अजित: संभव आदि चौबीस तीर्थंकरों के नामों का योग्य अर्थ समझ . लेना चाहिये तथा उनके वाक्ति कर्म का क्षय होने पर उन्होंने धर्म रूपी तीर्थ का प्रसार
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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