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[ गो. प्र. चिन्तामणि किया, वे देव और मनुष्यों से बंदनीय हुए, उन्होंने परमार्थ तत्त्व-जीव तत्व का सत्य स्वरूप जान लिया है । वे अठारह दोषों से रहित और सर्वज्ञ बने हैं ऐसा उन के गुणों .. का वर्णन करना चाहिये। तथा गुण वर्णन के साथ तीर्थकरों के चरणों का गंध धूपादि से पूजन कर मन नचन शरीर की विशुद्धि में उनके घरों को नमस्कार करना यह चतुर्विशति स्तब है। : आवश्यक
अरहंत सिद्ध पडिमात वसुदगुरण गुरुगुरुण रादौरा । किदियम्मेरिणदरेण य तियरस संकोचणं परणमो ॥६८३।।
अरहंत और सिद्धों के प्रतिबिम्ब, अनशनाद्रिक तप, अंगश्रुत ज्ञान ब पूर्वरूप श्रुत ज्ञान, व्याकरण तादिक का ज्ञान विशेष रूपी गुगा तथा इनसे जो श्रेष्ठता को प्राप्त हुए हैं, जो दीक्षा से श्वेष्ठ हैं ऐसे गुरुयों को कृतिकर्म में कहीं. हई विधि के अनुसार मनः शुद्धि, वचन शुद्धि और शरीर शुद्धि कर स्तुति पूर्वक नमस्कार करना वन्दना नामक मूलगुरंग हैं।
विशेष :---घातिकर्म का क्षय जिन्होंने किया है, वे ग्रहत् अर्थात् अरित्त है । और जिन्होंने पाठ कर्मों का नाश किया है । वे सिद्ध समझे जाते हैं अथवा गति, वचन और स्थान इन हेतुयों से अरिहन्त और सिद्ध में भेद हैं। अरिहन्त को मनुष्य गति का उद्रय है । सिद्ध गति रहित हैं। अरिहन्त दिव्य ध्वनि से उपदेश करते हैं । सिद्ध उपदेश रहित हैं और अशरीरी होने से बचन रहित हैं। अरिहन्त मध्य लोक में विहार करते हैं । सिद्ध लोकान में मोक्ष शिला पर सदा विराजमान हैं। प्रतिमा- . अरिहन्त की प्रतिमा प्रातिहार्य सहित होती है और सिद्धों की प्रतिमा प्रातिहार्य रहित होती है । अथवा कृत्रिम प्रतिगामों को अप्रतिमा कहते हैं । और अकृत्रिम प्रतिमा को सिद्ध प्रतिमा कहते हैं । तप-शारीर और इंद्रियों को जो सप्त करता है और कम की निर्जरा करता है, वह तप है ।
___ कृति कर्म-सिद्ध भक्ति, श्रुतभक्ति और गुरु भक्ति पूर्वक कायोत्सर्गादिक के . साथ बंदना करना। मुंड बंदना-श्रुस भवत्यादि रहित कायोत्सर्गादि रहित केवल
मस्तक से बंदना करना । मनः शुद्धि, वचन शुद्धि और काय शुद्धि करके अहंदादिको .. ..को प्रमगाम करता वह वंदना नामक मूल गुराण है।
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