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त्रिलोक सार में कहा है
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
पुरग्रामपवृनादि : लौकिकशास्त्र: लोकव्यवहारः । विनिर्मित आदिब्रह्मणा ।।१५३१।।
धर्मोऽपि दयामूलः अर्थात् यदि ब्रह्मा ऋषभनाथ भगवान ने पुर राम, पत्तनादि, लौकिकशास्त्र, लोक व्यवहार तथा दया मूलक धर्म की स्थापना की थी ।
अवसर्पिणी काल के तीसरे काल के अंत में चौदह कुलकर हुये थे । भगवान ऋषभदेव तथा चक्रवर्ती भरत भी कुलकर नाम से विख्यात हुए। इनको कुलों को धारण करने से कुलंधर और कुलों के करने में कुशल होने से कुलकर कहते थे ! तिलोयपणति में यही बात इन शब्दों द्वारा कही गई है-
सुपसिद्धा ।।१५३२।।
हुआ ?
कुलधारणा दु सव्वे कुल धारणामेण भुवरविक्वादा। कुलकरखम्मियकुसला कुलकरणार प्रश्न :---- --- उत्सर्पिणी काल का प्रारंभ कैसे उत्तर : ---- उत्सर्पिणी का प्रारम्भ काल - इस अवसर्पिणी का अंत होने पर उत्सव का प्रथम काल प्रतिदुःखमा श्राता है । वह २२ हजार वर्ष का है। उसके बाद २१ हजार वर्ष का दूसरा काल दुखमा नाम का श्राता है । इस दुःखमा काल के २० हजार वर्ष बीतने पर तथा एक हजार वर्ष शेष रहने पर कनक श्रादि सोलह कुलकर उत्सर्पिणी काल संबंधी उत्पन्न होते हैं । इन में प्रथम कुलकर की ऊंचाई चार हाथ है, तक्षा सोलहवें की ऊंचाई सात हाथ कही गई है ।
ये कुलकर कहते हैं कि
मदिरा कुणह रिंग पचेह श्रष्णाणि भुजह अहिच्छं । सोबखेणं करि विवाह बंधवपहुदिद्वारेण
।।१५३३॥
मथ करके आग को उत्पन्न करो । अन्न को पकाश्रो और विवाह करके बांधवादिक के निमित्त से इच्छानुसार सुख का उपभोग करो ।
अंतिम कुलकर के यहां प्रथम तीर्थंकर भगवान् महापद्म का जन्म होगा । उस समय से यहां विदेह वृत्ति सदृश होने लगती है । तिलोयपति में कहा है-'सक्काले थिरा चउदस हवंति तालपद्मजिरो । अंतिम कुलकर सुो विवेह वत्तीको होदि
।।१५३४।१२