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अध्याय : पाठवां ।
[ ६१७ उत्सपिणी के लोसरे काल दुषमसुषमा में १२० वर्ष की आयु होती है और सात हाथ प्रमाण शरीर की ऊंचाई रहती है । प्रथम तीर्थंकर को प्रायु १२० वर्ष के स्थान में ११६ वर्ष 'सोलसुत्तरं च सदं' कही गई है।
तीर्थंकर महापुरुष प्रश्न :- तीर्थंकर महापुरुषों का कार्य क्या है ?
उत्तर :-जब जगत में अंधकार का अखंड सामाज्य हो जाता है, तब नेत्रों की शक्ति कुछ कार्य नहीं कर पाती है। अंधकार नेत्रयुक्त मानव को भी अंध सदश बना देता है । इस पौद्गलिक अंधकार से गहरी अंधियारी मिथ्यात्व के उदय से प्राप्त होती है। उसके कारण यह ज्ञान वान जीव अपने स्वरूप को नहीं जान पाता है । मोहनीय कर्म के आदेशानुसार यह निंदनीय कार्य करता फिरता है । जड़ शरीर में यह मिथ्यात्वांध व्यक्ति अत्मिबुद्धि धारण करता है । जब इसे कोई सत्पुरुष समझाते हैं कि तुम चैतन्य पुंज झायक स्वभाव प्रात्मा हो । शरीर का तुमसे कोई संबंध नहीं है, तो यह अविवेकी उस वाणी को विष समान समझता है ।
सूर्योदय होते ही अंधकार का क्षय होता है, उसी प्रकार तीर्थंकर रूप धर्म सूर्य के उदय होते ही जगत में प्रवर्धमान मिथ्यात्व का अंधकार भी अंतः करण से दूर होकर प्रारणी में निजस्वरूप का अवबोध होने लगता है।
इस स्थिति में प्राचार्य रविषेण एक मार्मिक तथा सुयुक्ति समर्थित बात कहते हैं कि जब जमत में धर्मग्लानि बढ़ जाती है, सत्पुरुषों को कष्ट उठाना पड़ता है, तथा पाप वृद्धि बालों के पास विभूति का उदय होता है, तब तीर्थीकर रूप महान आत्मा उत्पन्न होकर सच्चे आत्मधर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाकर जीवों को पाप से विमुख बनाते हैं । पद्मपुराण में रविषेखाचार्य ने लिखा है
प्राचाराणा विधातेन कुदृष्टीनां च संपदा । धर्मग्लानि परिप्राप्ताच्छ्यन्ते जिनोत्तमाः ||१५३५
जब उत्तम प्राचार का विधात होता है, मिथ्याधर्मियों के समीप श्री कि बद्धि होती हैं, जैन धर्म के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है, तब तीर्थकर उत्पन्न होते हैं और जैन धर्म का उद्धार करते हैं।