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________________ अध्याय : पाठवां ] इस प्रसंग में महापुराण का यह कथन भी स्मरण योग्य है कि भगवान ऋषभदेव ने प्रजा के हित का विचार कर इन्द्र को स्मरण किया । तत्काल देवों सहित इन्द्र आदिनाथ प्रभु के पास आया और उसने नीचे लिखे अनुसार विभाग कर प्रजा की जीविका के उपाय किये ! शुभदिन, शुभनक्षत्र, शुभमुहूर्त तथा शुभलग्न के समय और सूर्य आदि ग्रहों के अपने-अपने उच्चस्थानों में स्थित रहने और जगद्गुरु भगवान के अनुकूल रहने पर इन्द्र के प्रथम ही मांगलिक कार्य किया और फिर भी उसी अयोध्या पुरी के बीच में जिन मन्दिर की रचना की। इसके बाद पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर प्रकार की चारों दिशाओं में भी यथाक्रम से जिन मन्दिरों की रचना की । कहा अथानुध्यानमात्रेण विभोः शुक्रः सहामरः । प्राप्तस्तज्जीवनोपायनित्यका द्विभागतः ॥ शुभे दिने सुनक्षत्रे सुमुहूर्ते शुभोदये । स्वोच्चस्थेषु पहेपुच्चः प्रानुकल्ये जगद्गुरोः ।। कृप्त प्रथम मांगल्ये सुरेन्द्रो जिनमंदिरम् । न्यवेशयत् पुरस्यास्य मध्ये विश्वप्यनुक्रमः ।। इस कथन से यह बात भी स्पष्ट होती है कि लोगों को जीविका का उपाय बताने के साथ उनके धर्माशंधन के हेतु जिनेन्द्र मंदिर की व्यवस्था की गई थी, जिससे षट्कर्म जनित दोषों का प्रक्षालन भी हो । जीविका का उपाय बताने के सिवाय यदि धर्म का कथन बताया होता और उसका साधन नहीं जुटाया गया होता, तो इससे जीवों का अच्छा कल्याण नहीं हो पाता । तीर्थंकर ऋषभनाथ प्रभु ने ऐसा मार्ग प्रदर्शन किया, जिससे समाज की योग्य व्यवस्था के साथ मात्मा का परिपूर्ण हित भी होता रहे। भगवान ने पापरहित भाजीविका के उपायों का समर्थन किया था। कहा यावती जगति वृत्तिः, अपापोपहता 'चया। सासर्वास्य मतेनासीत् . सहि माता सनातनः ।। उस समय जगत में पापरहित माजीविका के जो उपाय थे, वे सब भगवान् की संमति से प्रवृत्त हुए थे, क्योंकि ऋषभनाथ भगवान ही सनातन ब्रह्मा हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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