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________________ ६१४ ] [.. मो. प्र. चिन्तामणि प्रकाशमान होता है तथा · जहां मिथ्या संप्रदाय नहीं है, वहां भी वर्ण व्यवस्था है । उसके ही आधार पर भगवान् वृषभदेव ने इस भरत क्षेत्र में व्यवस्था के लिये आवश्यक तथा सूक्ष्म बातों को दिव्य ज्ञान द्वारा जान सके थे। ऐसी स्थिति में शंका के लिये स्थान नहीं रहता है । परम कारूणिक तीर्थकर वृषभदेब ने गम्भीर चिंतन के पश्चात् विदेह की वर्णाश्रम व्यवस्था के आधार पर तत्कालीन समाज के हितार्थ योजना की थी। उसमें छिद्रों की कल्पना करना योग्य नहीं है । वैदिकों की वर्ण व्यवस्था और जैन वर्ण व्यवस्था में अंतर है, यद्यपि बाह्यरूप में उनमें साम्य दिखता है। जैन व्यवस्था अहिंसा की आधार शिला पर अवस्थित है । उसके मूल में पक्षपात, विद्वष या घृणा का. सद्भाव नहीं है । यह पुर्णतया मनोवैज्ञानिक है। कोई प्रागमज्ञ विचारक यह कहते हैं कि जैनों की वर्ण व्यवस्था को ही वैदिकों ने अपनाकर अपनी कर्तृत्ववाद की संस्कृति की मुहर उस पर लगाई है।। प्रश्न :--कोई-कोई कह बैठते हैं, उपरोक्त मत तो जिनसेन स्वामी का रहा है, उसे उन्होंने ऋषभनाथ भगवान के नाम से लिखा है ? उत्तर :-यह कथन उचित नहीं है । यह परमागम की चर्चा कोई राजमीति की बात नहीं है। इसमें सर्वज्ञ, हितोपदेशी, वीतराग भगवान की दिव्यध्वनि से प्रकाशित तथा गरगधर देव द्वारा ग्रन्थरूप से रचित पदार्थ का निरूपण है । अतएव तत्त्व प्रेमी मुमुक्षुओं को वर्ण व्यवस्था के विषय में परमागमोक्त उक्त बात श्रद्धान करने योग्य है । इस व्यवस्था की उपेक्षा के कारण ही आज की भौतिक विकास युक्त दुनियां में घृणा, अशांति, असंतोष तथा विद्वेष की वृद्धि हो रही है। प्रश्न :---कर्म भूमि का प्रारम्भ किस प्रकार हुमा ? उत्तर :- कृतयुग (कर्मभूमि) का प्रारम्भ--- युमादिब्रह्मरणा सेन यवित्थं स कृतो युगः । ततः कृतयुगं नाम्ना तं पुराणविदो विदुः ।। युग के आदि विधाता ऋषभनाथ भगवान ने इस प्रकार कर्मयुग का प्रारम्भ किया था, इससे पुराणवेत्ता उन भगवान को कृतयुग के नाम से जानते हैं। प्राषाढ़ मास बहुल प्रति दिवसे कृतो । कृत्वा कृतयुगारंभं प्राजापत्यमुपेयिवान् ॥ कृतकृत्य भगवान ऋषभदेव ने आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन कृतयुग अर्थात् कर्मभूमि का प्रारम्भ करके प्रजापति पदं को प्राप्त किया था। monistandinin नमा Kadulhaniamstei n iMANSOURYuar4uit V -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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