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________________ अध्याय : पाठवा ] [ ६१३ त्या देवमादिकर्तारं कल्पानिपभियोग्नतम् । समाश्रिता कथं भीतेः पदं स्याम क्यं विभो ।। है भगवान् ! हम कल्पवृक्ष के समान उन्नत इस युग के आदिकर्ता आपके समीप आये हैं, इसलिए हमें भय किस प्रकार हो सकता है ? उनकी दीनवाणी को सुनकर भगवान ने यह निश्चय किया कि-- कर्म भूरध जातेयं व्यतीते कल्प भूरूहाम् । ततोऽन कर्मभिः षड्भिः प्रजानां जीवकोचिता ।। कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने पर अब यहां कर्मभूमि प्रगट हुई हैं, इसलिये प्रजा को असि अर्थात् शस्त्रसंचालन, मषि अर्थात् लेखन कार्य, कृषि, शिल्प, वारिणज्य तथा पशुपालन द्वारा आजीविका करना उचित है। उपरोक्त निश्चय भगवान ने गम्भीर विचार के उपरांत किया था। उन्होंने विशेष ज्ञानोपयोग द्वारा विदेह की वर्तमान स्थिति का विचार कर विदेह को आदर्श बना यहां की वर्णाश्रम व्यवस्था करने का निश्चय किया। जिनसेन स्वामी ने लिखा है पूर्वापर विदेहेषु या स्थितिः समवस्थिता । साद्य प्रवर्तनीयात्र ततोजीवंत्यमः प्रजाः ॥ पूर्व पश्चिम विदेह में जो स्थिति बर्तमान है, वही स्थिति आज यहां प्रवृत्त करने योग्य है। उससे यह प्रजा जीवित रह सकती है । षट्कर्माणि यथा तत्र यथा वर्णाश्रमस्थितिः । यथाग्राम गृहादीनां संस्त्यायाश्च पृथग्विधाः ॥ जैसे वहां असि, मधि आदि छह कर्म हैं । तथा वर्णाश्रम को व्यवस्था है और जैसी ग्राम, गृह आदि की अलग-अलग रचना है । तयात्राप्युचिता वृत्तिः उपायरेभिरंगिनाम् । नोपायान्तरमस्त्येषां प्राणिनां जीविका प्रति ॥ उसी प्रकार यहां भी होना चाहिये। इन्हीं उपायों से प्राणियों की आजीविका चल सकती है। इनकी आजीविका के लिये कोई अन्य उपाय नहीं है। ' इस कथन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वर्णाश्रम व्यवस्था जैन धर्म की किसी धर्म से उधार ली गई वस्तु नहीं है । जिस विदेह क्षेत्र में सदा धर्म का सूर्य ENamo
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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