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________________ ६१२ । - . - ... [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-भोग भूमि के अन्त में परिवर्तन कसे होता है? उत्तर :--भोग भूमि का अंत होने पर नैसर्गिक परिवर्तन भोग भूमि का अंत होने पर ते कल्पवृक्ष नष्ट हो गये थे। इससे प्रजा जन अत्यन्त व्याकुल हो गये थे । वातावरण में अद्भूत परिवर्तन हो रहा था। अनेक प्रकार के धान्यादि स्वयं उत्पन्न हो गये थे । इस विषय में जिनसेन स्वामी लिखते हैं... तदा पितृव्यतिक्रान्तावपत्यानीच तप्तवम् । कल्पवृक्षोचित स्थानं तान्यध्यासिषत स्फुटम् ॥१५२८॥ - जिस प्रकार पिता की मृत्यु होने पर उनके स्थान पर पुत्र प्रारुढ़ होता है, उसी प्रकार कल्पवृक्षों के अभाव होने पर वे धान्यादि उनके स्थान पर प्रारूत हुये थे । उस समय आकाश में मेष इकट्ठे होकर वर्षा करने लगे पर महाकवि उत्प्रेक्षा करते हैं :--- ध्वनन्तो ववृषुर्मुक्त स्कूल धारं पयोधराः । रुदन्त इव . शोकार्ताः कल्पवृक्ष..परिक्षये ॥१५२६॥ उस समय मेघ गर्जना पूर्वक स्थूल धारा से बरसते हुये ऐसे प्रतीत होते थे, मानों कल्पवृक्षों के क्षय हो जाने से शोकयुक्त होते हुये रो रहे हैं। प्रश्न :--प्रादि ब्रह्मा ने क्या व्यवस्था की प्रजा को ? उत्तर :--'प्रादि ब्रह्मा' श्री ऋषभनाथ तीर्थकर - भोगभूमियां जीवों का कथन करते समय तिलोयपपणात्ति में लिखा है कि 'जुगला कुल-जाति भेद होगा (४-३८७) अर्थात् उस युगल मनुष्यों में कुल, जाति का भेद नहीं था, तब कर्मभूमि में कुल जाति भेद के साथ वर्णन व्यवस्था अदि कैसे आ गई ? इस विषय में समाधान निमित्त महापुराण से महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होती है । बात यह है, भोगभूमि की प्रणाली लोप होने पर कल्पवृक्ष तो चले गये थे तथा कुछ समय के बाद बिना बोया धान्य का लाभ भी बन्द हो गया, तब महाराज नाभिराय की प्राज्ञा से दुःखी और क्षुधित भोगभूमियां भगवान ऋषभदेव के चरणों में गई और उन्होंने प्रार्थना की विभो समूलमुत्सन्नपितकल्पा महाध्रिया:. । फलस्यकृष्टपच्यानि सस्यान्यपि च नाधुना ॥१५३०॥ हे विभो पिता के समान हमारी रक्षा करने वाले कल्पवृक्ष समूल नष्ट हो गये और अब बिना बोया हुआ परिपाक को प्राप्त होने वा धान्य नहीं फलता है-- anitariandinokri..... -JDHR
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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