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अध्याय : पाठवां ।
[ ६११ उनमें कुल जाति का भेद नहीं कहा है (कुल-जादि भेद होणा-३८७) ।
वहां व्याघ्र प्रादिक भूमिचर और काक आदि नभचर तिर्यञ्च मांसाहार के बिना कल्पवृक्षों का मधुर फल भोगते हैं। अन्य तृणजीवी पशु युगल दिव्य तृणों का भक्षण करते हैं ।
जिन्होंने पूर्व में मनुष्य आयु को . बांध लिया है और पश्चात् तीर्थङ्कर के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त किया है, ऐसे क्षायिक सम्यग्दृष्टि पुरुष भी भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं। कितने ही मिथ्यादृष्टि मनुष्य निर्ग्रन्थं मुनियों को दानादि देकर भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं । पापों के त्यागी, गुणों के अनुरागी तथा मंदकषाय वाले भी वहां उत्पन्न होते हैं। ...
भोगभूमि में ग्राम नगरादिक सब नहीं होते। केवल वे सब कल्पवृक्ष होते हैं, जो भोगभूमिवासी जीवों को मनोवांछित वस्तु देते हैं । कहा भी है--- ..
ग्राम-णयरादि सव्वं होदिते होंति सब्बकप्पतरू। रिणय-रिणयमरणसा संकप्पिय-वत्थरिंग तिजुगलाणं ॥१५२६॥ :
भोगभूमि के पुरुष इन्द्र से भी अधिक सुन्दराकार होते हैं ( देविदादोदि सुन्दराकारा ) स्त्रियो अप्सराओं के सदृश होती हैं । भोग भूमिजों के युगल कदलीधात मरण से रहित होते हुए प्रायु पर्यन्त चकवर्ती के भोग समूह की अपेक्षा अनंत गुणे भोगों को भोगते हैं, कहा भी है ।
जुगलाणि अणतगुणं भोग चषकहर भोग योहादो। भुजति जाव प्राचं कवलीयादेश रहिदारिण ॥१५२७।।
तिलोयपण्णति में यह भी लिखा है, वे युगल कल्पवृक्षों से दी गई वस्तुओं को ग्रहण करके और विक्रिया से बहुत से शरीरों को बनाकर अनेक प्रकार के भोगों को भोगते हैं।
प्रश्न :--भोग भूमि में लिर्घञ्च कौन जीव होता है ?
उत्तर :--तिलोयपाति में इस प्रकार कहा है-'जो पापी जिनलिंग को ग्रहण करके संयम एवं सम्यक्त्व भाव को छोड़ देते हैं, और पश्चात् माया में प्रवृत्त होकर चरित्र को नष्ट करते हैं, तथा जो कोई मूर्ख मनुष्य कुलिगियों को नाना प्रकार के दान देते हैं या उनके भेष को धारण करते हैं, वे भोग भूमि में तिर्यञ्च होते हैं ।
(माथा ३७३-३७४)