________________
६१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि जाती है । देवों में पर्याप्ति पूर्ण होने के अन्तर्मुहूर्त में सम्यक्त्व उत्पन्न हो सकता है, इसी प्रकार अर्थात् देवों के समान नारकियों के वर्शन में कहा गया है । इससे स्पष्ट होता है कि कर्मभूमि का मनुष्य चारों गति में सबसे अधिक काल बीतने पर सम्यक्त्व पैदा करता है । एक दृष्टि से मनुष्य पर्याय है कि सम्पन्न करने के साथ सकल संयम को स्वीकार करने वाला साधु अन्तर्मुहूर्त में सर्वज्ञ परमात्मा भी बन सकता है।
प्रश्न :- भोमभूमि मनुष्यों के विषय में शातथ्य बातें कौनसी है ? उत्तर :--- भोगभूमि मनुष्यों के विषय में अनेक ज्ञातव्य बातें-तिलोयपण्यति के चतुर्थ अधिकार में लिखा है कि- 'भोगभूमि के मनुष्यों का शरीर बहुत बलशाली था। नौ हजार हाथियों के सदृश बल था !
'ठावरागः सहस्स - सरिस बल जुत्ता ।' वे आर्जव भाव सहित, मंदकषायी, सुशीलता पूर्ण, वज्रवृषभ नाराच संहनन युक्त, समचतुस्त्र संस्थान सहित, बालसूर्य सदृश तेजस्वी, कवलाहार करते हुए भी नीहार रहित और युगलधर्म युक्त होते हैं । उस काल में नर-नारी के अतिरिक्त अन्य परिवार नहीं होता । भोगभूमि के मनुष्य तथा तिचों की नौ मास आयु शेष रहने पर उनके गर्भ रहता है । और मृत्युकाल आने पर उनके युगल-संतान उत्पन्न होती है ।
मृत्यु होने पर भोगभूमि के मिथ्यादृष्टि मनुष्य तिर्यञ्च भवत्रिक में और सम्यग्दृष्टि सौधर्म ईशान स्वर्ग में जन्म लेते हैं । भोगभूमियां जीव जातिस्मरण से, कोई देवों के प्रतिबोधित करने से और कोई चारण मुनि यादि के उपदेश से सम्यक्त्व ग्रहण करते हैं । कहा भी है
जादि भररण केई केई पडियोहरलेण देयाणं ।
चारण मुरिए पहुदोणं सम्मतं तत्व गेहुंति ॥१५२४ ।। विशेष यह है कि उनमें संयम नहीं होता है । कहा भी हैते सब्बे वरजुला अलोणुपलपेम संमूढा 1
जम्हां सम्हा तेसुं सावय-बद-संयमोणत्थि ।। १५२५।। अर्थ – ये सब उत्तम युगल पारस्परिक प्रेम में अत्यन्त मुग्ध रहा करते हैं. इसलिये उनके श्रावक के व्रत और संयम नहीं होता। वे नर-नारी युगल मणित, शिल्प, गन्धर्व, चित्र यदि चौंसठ कलाओं में स्वभाव से ही अतिशय निपुण होते हैं ।