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अध्याय : ग्राठयां ]
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प्राणियों का उपकार करते हैं, उसी प्रकार दान के फल से ये कल्पवृक्ष भोगभूमियों को विपुल फल देते हैं ।
भोग भूमि में शरीर को पूर्णता-तिलोयपष्पति में कहा है कि उत्तम भोग भूमि में शरीर की पूर्णता होने पर २२ दिन में सम्यग्दर्शन धारण करने की योग्यता हो जाती है । मध्यम भोगभूमि में ३ दिन में तथा वन्य भोग में दिन में सम्यक्त्व लाभ करने की योग्यता प्राप्त होती है । ( गाथा ३८०-४०० - ४०६ अध्याय ४) हरिवंश पुराण सर्ग ६ के पद्म ६२, ६३, ६४ से यह सूचित होता है कि सभी भोगभूमियों में सप्त सप्ताहों में सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता श्राती है कहा भी है
तदस्ति पुंसा युग्मानां गर्भा शिलुठिताभूनाम् । दिनानि सप्त गच्छन्ति निजांगुष्ठावले हनेः ॥१.१५२१॥ गलामपि सप्तैव सप्तास्थिर पराक्रमः ।
स्थिरैश्च सप्ततैः सप्त कलासुत्र गणेषु च ॥ १५२२॥ कालेन सावता तेषां प्राप्तयौवन संपदाम् । सम्यक्त्वग्रहरणैरपि स्याद् योग्यता सवलभिवितः ।। १५२३॥
अनेक ग्रन्थों में कथन प्राता है कि ४९ उनचासवें दिन के पश्चात् भोगभूमियों सभ्यत्व ग्रहण की योग्यता होती है । तिलोपपत्ति में कथित २२ तथा ३५ दिन का काल उत्तम भोगभूमि तथा मध्यम भोगभूमि की विशेष अपेक्षा से कहा गया जानना चाहिये ।
कर्म भूमि के मनुष्यों में सम्यक्त्व की उत्पत्ति पर्याप्त अवस्था में आठ वर्ष की अवस्था के आगे होती हैं । मनुष्य की दृष्टि से भूमि तथा कर्म भूमि में समानता होते हुए भी सम्यक्त्व की उत्पत्ति सम्बन्धी योग्यता में काल कृत अन्तर इस बात को सूचित करता है कि सूक्ष्म दृष्टि से दोनों अवस्थाओं भिन्नता भी है । सुख और ग्रानन्द की सामग्री भोग भूमि में प्रचुर प्रमाण में पाई जाती है, किन्तु मुक्ति प्राप्ति के योग्य श्रेष्ठ रीति से रत्नत्रय धर्म की समाराधना कर्म भूमि में ही होती है, अतएव कर्म-भूमि में मनुष्य पर्याय पाने का विशेष प्रयत्न है. 1:
यह बात भी कम महत्व की नहीं है कि तिर्यञ्चों में दिवस पृथकत्व अर्थात् तीन से अधिक और नौ के भीतर दिनों में सम्यक्त्व उत्पन्न करने की योग्यता पाई